FIR आपराधिक जाँच की शुरुआत है, दोषी होने का फ़ैसला नहीं। FIR दर्ज होने के बाद के पहले कुछ दिनों में आप क्या करते हैं, पुलिस के नोटिस का जवाब कैसे देते हैं, क्या कहते हैं और कौन-से दस्तावेज़ सुरक्षित रखते हैं, यह अक्सर पूरे मामले की दिशा तय करता है।
पहले कदम
- FIR की प्रति लें। यह आमतौर पर हरियाणा पुलिस के पोर्टल पर ऑनलाइन मिल जाती है, या थाने अथवा अदालत से ली जा सकती है।
- गिरफ्तारी के जोखिम का आकलन करें और ज़रूरत हो तो कोई और कदम उठाने से पहले अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करें।
- पुलिस के नोटिस को नज़रअंदाज़ न करें। पेश होने के नोटिस (BNSS धारा 35(3)) का जवाब दिया जाना चाहिए, बेहतर है कि कानूनी सलाह लेकर।
- अपने पक्ष के सबूत सुरक्षित रखें: संदेश, ईमेल, बैंक रिकॉर्ड, कॉल लॉग और गवाहों का विवरण।
FIR रद्द (क्वैश) कराना
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय BNSS की धारा 528 (पहले CrPC की धारा 482) के तहत FIR रद्द कर सकता है, उदाहरण के लिए जब:
- आरोपों को सच मान लेने पर भी कोई अपराध नहीं बनता;
- विवाद मूल रूप से सिविल या व्यावसायिक है और उसे आपराधिक रंग दे दिया गया है;
- FIR साफ़ तौर पर दुर्भावना से या निजी रंजिश निकालने के लिए दर्ज कराई गई है; या
- पक्षों ने वास्तव में आपस में समझौता कर लिया है, उन मामलों में जहाँ अदालत FIR रद्द करना उचित समझे।
अदालतें सर्वोच्च न्यायालय के तय सिद्धांतों का पालन करती हैं, जिनमें हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) के प्रसिद्ध दिशानिर्देश शामिल हैं।
जाँच और ट्रायल के दौरान
- जाँच एकतरफ़ा हो तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रतिवेदन
- चार्जशीट दाखिल होने के बाद, सामग्री आरोपों का समर्थन न करे तो डिस्चार्ज का आवेदन
- पूरे ट्रायल में बचाव: गवाहों से जिरह, बचाव पक्ष के सबूत और अंतिम बहस
- आदेशों और दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील और पुनरीक्षण
इसमें किस तरह सहायता मिल सकती है
FIR और सबूतों की समीक्षा करके यह सलाह दी जाती है कि पुलिस को कैसे जवाब दें, और सही उपाय चुना जाता है, चाहे वह अग्रिम जमानत हो, FIR रद्द कराना हो, डिस्चार्ज हो या ट्रायल में पूरा बचाव।