अधिवक्ता
आशुतोष हंस
आपराधिक मामलों में बचाव, अग्रिम और नियमित जमानत, साइबर अपराध और EOW मामले, साथ ही चेक बाउंस, संपत्ति और पारिवारिक विवाद। ज़िला एवं सत्र न्यायालय, गुरुग्राम और दिल्ली NCR में वकालत।
किसी कानूनी समस्या का सामना कर रहे हैं?
ये वे स्थितियाँ हैं जिनमें लोग सबसे अधिक सलाह लेने आते हैं। हर विषय पर हिन्दी में विस्तृत जानकारी पढ़ें; आपकी स्थिति मिलती-जुलती हो तो एक छोटी बातचीत से यह समझने में मदद मिल सकती है कि आप कहाँ खड़े हैं।
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गिरफ्तारी हुई है या गिरफ्तारी का डर है?
अग्रिम जमानत, नियमित जमानत और गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा।
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आपके खिलाफ FIR दर्ज हुई है?
जाँच के दौरान सलाह, ट्रायल में बचाव और FIR रद्द (क्वैश) कराने की याचिका।
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ऑनलाइन धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं?
साइबर अपराध की शिकायत, पैसा फ्रीज़ कराने और वापस पाने के कदम।
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साइबर सेल ने बैंक खाता फ्रीज़ कर दिया?
बैंक खाता अनफ्रीज़ कराने और रोकी गई रकम छुड़ाने के आवेदन।
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पैसों की धोखाधड़ी हुई है?
EOW में शिकायत, और धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात व निवेश घोटाले के मामलों में बचाव।
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चेक बाउंस हो गया?
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत लीगल नोटिस और शिकायत।
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दहेज या क्रूरता (498A) का मामला?
दहेज, क्रूरता और वैवाहिक आपराधिक मामलों में अग्रिम जमानत और बचाव।
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तुरंत स्टे या निषेधाज्ञा चाहिए?
कब्ज़ा, अवैध निर्माण, संपत्ति की बिक्री या अनुबंध भंग रोकने के लिए निषेधाज्ञा।
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संपत्ति का विवाद?
टाइटल की जाँच, कब्ज़ा और बँटवारे के मुकदमे, निषेधाज्ञा और संपत्ति के दस्तावेज़।
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पारिवारिक या वैवाहिक समस्या?
तलाक, भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और घरेलू हिंसा के मामले।
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पुलिस FIR दर्ज नहीं कर रही?
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय के उपाय।
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NDPS एक्ट में मामला दर्ज हुआ है?
नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में जमानत और ट्रायल में बचाव।
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बिल्डर ने फ़्लैट देने में देरी की?
कब्ज़ा, ब्याज सहित रिफ़ंड और मुआवज़े के लिए RERA शिकायत।
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मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) क्लॉज़ वाला विवाद?
अदालत से अंतरिम राहत, मध्यस्थ की नियुक्ति, और अवॉर्ड को चुनौती या लागू कराना।
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लीगल नोटिस भेजना है या मिला है?
सिविल, आपराधिक और व्यावसायिक मामलों में लीगल नोटिस और उसका जवाब।
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विरासत या वसीयत का विवाद?
वसीयत, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र, प्रोबेट और पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा।
इन अदालतों में पेश होते हैं
- ज़िला एवं सत्र न्यायालय, गुरुग्राम
- तीस हज़ारी कोर्ट, दिल्ली
- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
- दिल्ली उच्च न्यायालय
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आप क्या उम्मीद कर सकते हैं
पहली बातचीत से लेकर अंतिम आदेश तक, हर मामले को एक जैसी सावधानी और ध्यान मिलता है।
पहली मुलाकात से स्पष्ट सलाह
कोई भी कदम उठाने से पहले आपको साफ़ बताया जाता है कि कानून में आपकी स्थिति क्या है, आपके पास क्या विकल्प हैं, अनुमानित समय कितना लगेगा और हर रास्ते के जोखिम क्या हैं।
ज़रूरी मामलों को प्राथमिकता
गिरफ्तारी या उसका डर, फ्रीज़ बैंक खाते और तुरंत स्टे के आवेदन प्राथमिकता से लिए जाते हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में एक दिन की देरी भी मायने रखती है।
पूरी तैयारी
अदालत में कुछ भी दाखिल करने या दूसरे पक्ष को भेजने से पहले हर तथ्य और दस्तावेज़ की जाँच की जाती है, और मौजूदा कानून व हाल के फ़ैसले देखे जाते हैं।
हर स्तर पर प्रतिनिधित्व
थाने और ट्रायल कोर्ट से लेकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय तक, आपका मामला हर उस मंच तक ले जाया जा सकता है जहाँ उसे जाना हो।
नियमित जानकारी
हर सुनवाई के बाद आपको बताया जाता है कि क्या हुआ और आगे क्या होगा, ताकि आपको अपने मामले की स्थिति का अंदाज़ा न लगाना पड़े।
पूरी गोपनीयता
आप जो कुछ भी बताते हैं, वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 132 के तहत अधिवक्ता–मुवक्किल विशेषाधिकार से सुरक्षित रहता है।
परिचय
आशुतोष हंस ज़िला एवं सत्र न्यायालय, गुरुग्राम और तीस हज़ारी कोर्ट, दिल्ली में वकालत करते हैं, और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय तथा दिल्ली उच्च न्यायालय में पेश होते हैं।
उनकी वकालत मुख्य रूप से आपराधिक कानून पर केंद्रित है: अग्रिम और नियमित जमानत, FIR और जाँच के चरण में सलाह, ट्रायल में बचाव, आपराधिक पुनरीक्षण और FIR रद्द (क्वैश) कराने की याचिकाएँ। साइबर अपराध के मामले, जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी में गया पैसा वापस पाने की शिकायतें और साइबर सेल द्वारा फ्रीज़ किए गए बैंक खातों को छुड़ाने के आवेदन, और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के धोखाधड़ी व निवेश घोटाले के मामले भी उनके काम का बड़ा हिस्सा हैं।
सिविल मामलों में वे कब्ज़ा, अवैध निर्माण और विवादित संपत्ति की बिक्री के विरुद्ध तुरंत निषेधाज्ञा (स्टे) और मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के मामले देखते हैं। साथ ही चेक बाउंस, संपत्ति, पारिवारिक व वैवाहिक विवाद, वसूली के मुकदमे, RERA, उपभोक्ता और रिट मामले भी लेते हैं।
उनका तरीका सीधा है: कोई भी कदम उठाने से पहले कानूनी स्थिति और विकल्प सरल भाषा में समझाना, हर दस्तावेज़ सावधानी से तैयार करना, और हर चरण पर मुवक्किल को जानकारी देते रहना।
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