मध्यस्थता
गुरुग्राम में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) शुरू करने का नोटिस मिला? इसका मतलब क्या है और जवाब कैसे दें
मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 21 के तहत नोटिस से आर्बिट्रेशन औपचारिक रूप से शुरू हो जाता है। ऐसे नोटिस का मतलब क्या है, इसे नज़रअंदाज़ करना जोखिम भरा क्यों है, प्रस्तावित आर्बिट्रेटर को कैसे जाँचें, और ज़रूरी समय-सीमाएँ क्या हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →किसी वकील के दफ़्तर से एक कूरियर या ईमेल आता है। उसमें किसी ऐसे एग्रीमेंट का ज़िक्र होता है जिस पर आपने कुछ समय पहले दस्तख़त किए थे, जैसे वेंडर कॉन्ट्रैक्ट, लोन या लीज़ का दस्तावेज़, फ़्रैंचाइज़ी या पार्टनरशिप डीड, और लिखा होता है कि विवाद पैदा हो गया है और भेजने वाला "आर्बिट्रेशन इनवोक" कर रहा है, यानी मध्यस्थता शुरू कर रहा है। उसमें किसी आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) का नाम भी हो सकता है और कुछ ही दिनों में सहमति देने को कहा जा सकता है। गुरुग्राम में बहुत से लोगों को ऐसा नोटिस मिलता है और वे समझ नहीं पाते कि यह अदालत का समन है या नहीं, जवाब देना ज़रूरी है या नहीं, और अगर इसे नज़रअंदाज़ कर दें तो क्या होगा।
यह लेख बताता है कि आर्बिट्रेशन शुरू करने का नोटिस क्या होता है, यह क्यों अहम है, और नोटिस मिलने के बाद किन व्यावहारिक कदमों पर विचार करना चाहिए।
आर्बिट्रेशन शुरू करने का नोटिस क्या है?
अगर आपके एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ है, तो उसके तहत होने वाले विवादों का फ़ैसला सामान्य दीवानी अदालत की जगह एक आर्बिट्रेटर करता है, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के तहत। अधिनियम की धारा 21 के अनुसार, जब तक पक्षों ने कुछ और तय न किया हो, आर्बिट्रेशन की कार्यवाही उस तारीख से शुरू मानी जाती है जिस दिन दूसरे पक्ष को विवाद आर्बिट्रेशन में भेजने का अनुरोध मिलता है। आपको जो नोटिस मिला है, वही यह अनुरोध है।
यानी यह नोटिस अदालत का समन नहीं है, और न ही आपके खिलाफ़ कोई आदेश है। लेकिन यह कानूनी रूप से अहम दस्तावेज़ है। इससे आर्बिट्रेशन औपचारिक रूप से शुरू हो जाता है, इससे वह तारीख तय होती है जिससे भेजने वाले के दावों की लिमिटेशन (समय-सीमा) आम तौर पर रुकी हुई मानी जाती है, और आम तौर पर इसी से आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है।
ऐसे नोटिस में आम तौर पर क्या होता है?
- उस एग्रीमेंट और आर्बिट्रेशन क्लॉज़ का हवाला जिस पर भरोसा किया जा रहा है;
- विवाद और दावों का सार, जैसे बकाया रकम, हर्जाना या जमा राशि की वापसी;
- प्रस्तावित आर्बिट्रेटर का नाम, या अगर क्लॉज़ में तीन सदस्यों वाले ट्रिब्यूनल का प्रावधान है तो आपसे अपना आर्बिट्रेटर नामित करने का अनुरोध; और
- वह समय जिसके भीतर आपसे जवाब देने या सहमति देने को कहा गया है।
नोटिस में सबूतों के साथ पूरा केस लिखना ज़रूरी नहीं है। विस्तृत दावा बाद में आर्बिट्रेटर के सामने दाखिल किए जाने वाले स्टेटमेंट ऑफ़ क्लेम में आता है।
कदम 1: आर्बिट्रेशन क्लॉज़ ध्यान से पढ़ें
जवाब देने से पहले एग्रीमेंट निकालें और विवाद निपटान वाला क्लॉज़ ध्यान से पढ़ें। देखें:
- आर्बिट्रेटर कौन नियुक्त करेगा: दोनों पक्ष मिलकर, हर पक्ष एक-एक नामित करे, कोई संस्था, या सिर्फ़ एक पक्ष।
- कितने आर्बिट्रेटर: एक अकेला आर्बिट्रेटर या तीन सदस्यों का ट्रिब्यूनल।
- सीट या वेन्यू: आर्बिट्रेशन के लिए तय जगह, जिससे आम तौर पर तय होता है कि कौन-सी अदालतें प्रक्रिया की निगरानी करेंगी।
- कोई पूर्व-शर्तें: कुछ क्लॉज़ में आर्बिट्रेशन शुरू करने से पहले एक तय समय तक बातचीत या मीडिएशन ज़रूरी होता है।
- क्या यह विवाद क्लॉज़ के दायरे में आता भी है: हो सकता है क्लॉज़ सिर्फ़ कुछ तरह के विवादों पर लागू हो, या दावा किसी दूसरे एग्रीमेंट से जुड़ा हो।
कदम 2: नोटिस को नज़रअंदाज़ न करें
नोटिस को नज़रअंदाज़ करने से आर्बिट्रेशन रुकता नहीं है। अगर तय अवधि में, आम तौर पर 30 दिनों में, पक्ष आर्बिट्रेटर पर सहमत नहीं होते, तो भेजने वाला धारा 11 के तहत आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के लिए अदालत में आवेदन कर सकता है। घरेलू (domestic) आर्बिट्रेशन में यह आवेदन हाईकोर्ट में जाता है। इसके बाद आर्बिट्रेशन आपकी भागीदारी के साथ या उसके बिना आगे बढ़ेगा।
धारा 25 के तहत, अगर प्रतिवादी (respondent) स्टेटमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस दाखिल नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल कार्यवाही जारी रख सकता है, और अगर कोई पक्ष पेश नहीं होता या सबूत नहीं देता, तो ट्रिब्यूनल आगे बढ़कर अपने सामने मौजूद सबूतों के आधार पर अवॉर्ड (फ़ैसला) दे सकता है। आपकी गैरहाज़िरी में दिया गया अवॉर्ड बाद में आपके खिलाफ़ उसी तरह लागू कराया जा सकता है जैसे दीवानी अदालत की डिक्री, और अवॉर्ड को चुनौती देने के आधार सीमित होते हैं। शुरुआत में चुप रहना अक्सर बाद में मुश्किलें बढ़ा देता है।
कदम 3: प्रस्तावित आर्बिट्रेटर को ध्यान से जाँचें
आर्बिट्रेटर का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना ज़रूरी है। धारा 12 के तहत, जिस व्यक्ति से आर्बिट्रेटर बनने के लिए संपर्क किया जाता है, उसे लिखित में ऐसी हर परिस्थिति बतानी होती है जिससे उसकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता पर उचित संदेह हो सकता हो। धारा 12(5), सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) के साथ पढ़ने पर, कुछ लोगों को पूरी तरह अयोग्य बनाती है, जैसे किसी पक्ष का कर्मचारी, कंसल्टेंट या सलाहकार, या ऐसा व्यक्ति जिसका किसी पक्ष से करीबी व्यापारिक संबंध हो। यह अयोग्यता सिर्फ़ विवाद पैदा होने के बाद किए गए स्पष्ट लिखित समझौते से ही माफ़ (waive) की जा सकती है।
अदालतों ने उन क्लॉज़ की भी बारीकी से जाँच की है जो सिर्फ़ एक पक्ष को आर्बिट्रेटर चुनने देते हैं। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि ऐसा क्लॉज़, जो एक पक्ष को अकेले ही एकमात्र आर्बिट्रेटर नियुक्त करने देता है, स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह पक्षों के साथ समान व्यवहार के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अगर नोटिस में बस यह बताया गया है कि भेजने वाले ने अपनी पसंद का आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया है, तो यह जाँचने लायक अहम बात है।
अगर आपके पास किसी आर्बिट्रेटर को चुनौती देने के आधार हैं, तो धारा 13 के तहत आम तौर पर ट्रिब्यूनल के गठन की जानकारी मिलने या आपत्ति वाली परिस्थितियों का पता चलने के 15 दिनों के भीतर ट्रिब्यूनल के सामने चुनौती उठानी होती है। देरी करने पर आपत्ति का अधिकार खत्म हो सकता है।
कदम 4: सोच-समझकर जवाब भेजें
दिए गए समय के भीतर लिखित जवाब देना आम तौर पर उचित रहता है। तथ्यों के हिसाब से, जवाब में यह हो सकता है:
- दावों से इनकार, संक्षेप में और बिना ग़ैरज़रूरी स्वीकारोक्ति के;
- आपत्ति कि विवाद क्लॉज़ के दायरे में नहीं आता, पूर्व-शर्तें पूरी नहीं हुईं, या दावे समय-सीमा से बाहर (time-barred) हैं;
- कारणों के साथ प्रस्तावित आर्बिट्रेटर या नियुक्ति के तरीके पर आपत्ति;
- अगर क्लॉज़ में प्रावधान हो, तो कोई दूसरा आर्बिट्रेटर प्रस्तावित करना या अपना आर्बिट्रेटर नामित करना; और
- काउंटर-क्लेम (प्रति-दावा) उठाने का अपना अधिकार सुरक्षित रखना।
जवाब रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है, इसलिए उसके शब्द मायने रखते हैं। हमारा लीगल नोटिस पेज सामान्य रूप से समझाता है कि औपचारिक नोटिसों के जवाब सावधानी से क्यों तैयार किए जाने चाहिए।
कदम 5: आर्बिट्रेटर नियुक्त होने के बाद की समय-सीमाएँ जानें
प्लीडिंग्स (दलीलें)
दावेदार (claimant) स्टेटमेंट ऑफ़ क्लेम दाखिल करता है और प्रतिवादी स्टेटमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस। प्रतिवादी काउंटर-क्लेम या सेट-ऑफ़ भी उठा सकता है, अगर वह आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के दायरे में आता हो। धारा 23(4) के तहत, स्टेटमेंट ऑफ़ क्लेम और डिफ़ेंस उस तारीख से छह महीने के भीतर पूरे होने चाहिए जिस दिन आर्बिट्रेटर या सभी आर्बिट्रेटरों को उनकी नियुक्ति का लिखित नोटिस मिलता है।
क्षेत्राधिकार (jurisdiction) पर आपत्ति
अगर आपका कहना है कि ट्रिब्यूनल को क्षेत्राधिकार नहीं है, जैसे कोई वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट नहीं है या विवाद उसके बाहर है, तो धारा 16 के तहत यह आपत्ति स्टेटमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस दाखिल करने से पहले या उसी समय उठानी होती है, उसके बाद नहीं।
अवॉर्ड का समय
धारा 29A के तहत, घरेलू आर्बिट्रेशन में अवॉर्ड प्लीडिंग्स पूरी होने की तारीख से 12 महीने के भीतर दिया जाना चाहिए। पक्ष आपसी सहमति से इसे छह महीने और बढ़ा सकते हैं, और उसके आगे किसी भी विस्तार के लिए अदालत में आवेदन करना पड़ता है।
कदम 6: ज़रूरत हो तो तुरंत सुरक्षा पर विचार करें
सिर्फ़ दावेदार ही नहीं, प्रतिवादी भी अंतरिम सुरक्षा माँग सकता है। अगर इस बात का असली खतरा है कि दूसरा पक्ष कोई सिक्योरिटी चेक या बैंक गारंटी भुना लेगा, विवादित माल बेच देगा, या किसी और तरह आपकी स्थिति को नुकसान पहुँचाएगा, तो धारा 9 के तहत अदालत से या धारा 17 के तहत ट्रिब्यूनल से अंतरिम राहत माँगी जा सकती है। इसे हमने अपने पहले के लेख धारा 9 के तहत अदालत से तुरंत सुरक्षा में समझाया है।
कदम 7: समझौते का विकल्प ध्यान में रखें
आर्बिट्रेशन शुरू करने के नोटिस से समझौते का रास्ता बंद नहीं होता। पक्ष किसी भी चरण में समझौता कर सकते हैं, और अधिनियम के तहत, अगर कार्यवाही के दौरान समझौता हो जाता है, तो ट्रिब्यूनल उस समझौते को सहमत शर्तों पर आर्बिट्रल अवॉर्ड के रूप में दर्ज कर सकता है, जिसका दर्जा किसी भी दूसरे अवॉर्ड जैसा ही होता है। आर्बिट्रेशन का खर्च, जिसमें आर्बिट्रेटर की फ़ीस भी शामिल है, काफ़ी हो सकता है, इसलिए शुरुआत में ही यथार्थवादी आकलन दोनों पक्षों के लिए उपयोगी रहता है।
कौन-से दस्तावेज़ जुटाएँ
- पूरा हस्ताक्षरित एग्रीमेंट, उसके अनुलग्नकों (annexures) और किसी भी संशोधन के साथ;
- दूसरे पक्ष के साथ हुआ सारा पत्राचार, ईमेल और मैसेज समेत;
- विवाद से जुड़े इनवॉइस, लेजर, भुगतान के रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट;
- पहले के कोई नोटिस, जवाब या समझौते की बातचीत; और
- वह लिफ़ाफ़ा या ईमेल जिससे पता चले कि नोटिस आपको किस तारीख को मिला।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-madhyasthata-aarbitreshan-shuru-karane-ka-notis-mila-isaka-matalab-kya-hai-au
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.