जमानत
गुरुग्राम में जमानत मिल गई, पर ज़मानतदार नहीं मिल रहा? BNSS के तहत बेल बॉन्ड और ज़मानतदार (श्योरिटी) कैसे काम करते हैं
जमानत का आदेश होने के बाद रिहाई तभी होती है जब बेल बॉन्ड और ज़मानतदार स्वीकार हो जाएँ। ज़मानतदार कौन बन सकता है, कौन-से कागज़ चाहिए, ज़मानतदार की ज़िम्मेदारी क्या है, और बॉन्ड की रकम ज़्यादा हो तो क्या करें।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →बहुत से परिवारों के लिए "जमानत मिल गई" सुनने की राहत के तुरंत बाद एक नई चिंता शुरू हो जाती है। आदेश में लिखा होता है कि आरोपी को एक निश्चित रकम का बेल बॉन्ड और एक या दो ज़मानतदार (surety) देने पर रिहा किया जाएगा। ज़मानतदार कौन बन सकता है? कौन-से कागज़ चाहिए? अगर आरोपी अदालत में पेश न हो, तो ज़मानतदार का क्या होगा? और अगर कोई भी ज़मानतदार बनने को तैयार न हो, तब क्या?
यह लेख आसान भाषा में बताता है कि गुरुग्राम में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की जगह ली है, बेल बॉन्ड और ज़मानतदार कैसे काम करते हैं। बॉन्ड से जुड़े नियम BNSS के अध्याय XXXV में हैं, मुख्य रूप से धारा 484 से 492 में।
जमानत आदेश, बेल बॉन्ड और ज़मानतदार: तीन अलग चीज़ें
- जमानत आदेश (bail order) अदालत का वह फ़ैसला है कि व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है, साथ में रिहाई की शर्तें।
- बेल बॉन्ड (bail bond) वह लिखित वचन है जिस पर आरोपी एक तय रकम के लिए हस्ताक्षर करता है, कि वह हर तारीख पर अदालत में पेश होगा और शर्तों का पालन करेगा। धारा 485 BNSS (पहले धारा 441 CrPC) के तहत आरोपी यह बॉन्ड भरता है, और जहाँ ज़मानतदार ज़रूरी हों, वे भी इससे बँध जाते हैं।
- ज़मानतदार (surety) वह व्यक्ति है जो अदालत को गारंटी देता है कि आरोपी पेश होगा और शर्तें मानेगा। अगर आरोपी चूक करे, तो ज़मानतदार से बॉन्ड में लिखी रकम वसूली जा सकती है।
रिहाई असल में तब तक नहीं होती जब तक अदालत बॉन्ड (और आदेश हो तो ज़मानतदारों के बॉन्ड) स्वीकार न कर ले। धारा 487 BNSS (पहले धारा 442 CrPC) के तहत बॉन्ड भरने के बाद व्यक्ति को रिहा किया जाता है, और अगर वह जेल में है, तो अदालत जेल को रिहाई का आदेश भेजती है।
ज़मानतदार कौन बन सकता है?
कानून में कोई तय योग्यता नहीं लिखी, लेकिन अदालत को संतुष्ट होना चाहिए कि ज़मानतदार आर्थिक रूप से सक्षम और भरोसेमंद है, यानी ज़रूरत पड़ने पर बॉन्ड की रकम चुका सके और आरोपी से उसका कोई असली जुड़ाव हो। व्यवहार में अदालतें आम तौर पर इन्हें स्वीकार करती हैं:
- परिवार का सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त जिसका पक्का पता हो, अक्सर उसी क्षेत्र में
- ऐसा व्यक्ति जिसके पास संपत्ति हो, या नियमित आय या बैंक बैलेंस हो, जिसकी कीमत मोटे तौर पर बॉन्ड की रकम के बराबर हो
- ऐसा वयस्क जो समझता हो कि वह किस चीज़ पर हस्ताक्षर कर रहा है और खुद ऐसी किसी कार्यवाही का सामना न कर रहा हो
धारा 486 BNSS (पहले धारा 441A CrPC) के तहत हर ज़मानतदार को अदालत के सामने एक घोषणा (declaration) करनी होती है कि वह पहले से कितने लोगों का ज़मानतदार है, ज़रूरी विवरण के साथ। इससे अदालत देख पाती है कि कहीं एक ही व्यक्ति बार-बार ज़मानतदार तो नहीं बन रहा।
ज़मानतदार से आम तौर पर कौन-से कागज़ माँगे जाते हैं
ज़रूरतें अदालत और मामले के हिसाब से बदलती हैं, लेकिन गुरुग्राम ज़िला अदालतों में ज़मानतदार से आम तौर पर ये लाने को कहा जाता है:
- पहचान पत्र, जैसे आधार कार्ड, वोटर ID या पासपोर्ट, फ़ोटो के साथ
- पते का सबूत
- आर्थिक क्षमता का सबूत, जैसे संपत्ति का कागज़ (रजिस्ट्री, ज़मीन के लिए जमाबंदी या फ़र्द), फ़िक्स्ड डिपॉज़िट, बैंक स्टेटमेंट, या गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट, जो भी अदालत स्वीकार करे
- कभी-कभी एक हलफ़नामा, या उन दूसरे मामलों की घोषणा जिनमें वह ज़मानतदार है
अदालत स्वीकार करने से पहले ज़मानतदार के कागज़ों का सत्यापन (verification) भी करवा सकती है। अच्छा रहता है कि वकील से पहले ही पूछ लें कि उस अदालत को ठीक-ठीक क्या चाहिए, ताकि किसी एक कागज़ की कमी से रिहाई में देरी न हो।
अगर बॉन्ड की रकम बहुत ज़्यादा हो तो?
जो जमानत भरी ही न जा सके, वह असल में जमानत नहीं है। धारा 484 BNSS (पहले धारा 440 CrPC) कहती है कि हर बॉन्ड की रकम मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तय होनी चाहिए और ज़रूरत से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। हाईकोर्ट या सेशन कोर्ट निर्देश दे सकता है कि पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा माँगी गई जमानत की रकम कम की जाए।
इसलिए अगर रकम या ज़मानतदारों की संख्या परिवार की पहुँच से बाहर है, तो आदेश देने वाली अदालत में शर्त बदलने के लिए, या ऊपरी अदालत में रकम घटाने के लिए आवेदन किया जा सकता है। अदालतें बार-बार इस बात पर चिंता जता चुकी हैं कि कई लोग जमानत मिलने के बाद भी सिर्फ़ इसलिए जेल में रहते हैं क्योंकि वे ज़मानतदार नहीं जुटा पाते, और तथ्यों के हिसाब से अदालतें ऐसी शर्तों में ढील दे सकती हैं।
ज़मानतदार की जगह नकद जमा
धारा 490 BNSS (पहले धारा 445 CrPC) के तहत अदालत या अधिकारी व्यक्ति को ज़मानतदारों वाला बॉन्ड भरने के बजाय एक रकम या सरकारी प्रॉमिसरी नोट जमा करने की अनुमति दे सकता है। यह हर मामले में नहीं मिलता; यह अदालत के विवेक पर है, और अच्छे आचरण (good behaviour) के बॉन्ड पर लागू नहीं होता। जहाँ ज़मानतदार ढूँढना सच में मुश्किल हो, वहाँ इसके बारे में पूछना ठीक रहता है।
ज़मानतदार की असल ज़िम्मेदारी क्या है?
ज़मानतदार बनना एक गंभीर ज़िम्मेदारी है, कोई औपचारिकता नहीं। अगर आरोपी पेश नहीं होता या बॉन्ड की शर्तें तोड़ता है, तो अदालत धारा 491 BNSS (पहले धारा 446 CrPC) के तहत बॉन्ड को ज़ब्त (forfeit) मान सकती है। प्रक्रिया मोटे तौर पर यह है:
- अदालत बॉन्ड ज़ब्त मानने के अपने कारण दर्ज करती है।
- वह बॉन्ड से बँधे व्यक्ति से, ज़मानतदार सहित, रकम चुकाने या यह कारण बताने (show cause) को कहती है कि रकम क्यों न वसूली जाए।
- अगर पर्याप्त कारण नहीं बताया जाता और रकम नहीं चुकाई जाती, तो अदालत कानून के अनुसार उसे वसूल सकती है, जिसमें संपत्ति की कुर्की और बिक्री भी शामिल हो सकती है।
अदालत के पास जुर्माने का कुछ हिस्सा माफ़ करके केवल एक भाग वसूलने की शक्ति भी है। ऐसा नोटिस मिलने पर ज़मानतदार को जवाब देना चाहिए और कोई असली कारण बताना चाहिए, जैसे आरोपी को पेश करवाने के लिए की गई कोशिशें। धारा 492 BNSS (पहले धारा 446A CrPC) के तहत, जहाँ किसी शर्त के उल्लंघन पर बॉन्ड ज़ब्त होता है, वहाँ बॉन्ड और बेल बॉन्ड रद्द हो जाते हैं, और आरोपी को नई जमानत देनी पड़ सकती है।
क्या ज़मानतदार बाद में हट सकता है?
हाँ। धारा 489 BNSS (पहले धारा 444 CrPC) के तहत ज़मानतदार किसी भी समय मजिस्ट्रेट से बॉन्ड से मुक्त (discharge) किए जाने का आवेदन कर सकता है, या तो पूरी तरह या उस व्यक्ति के संबंध में जिसका वह ज़मानतदार बना था। तब मजिस्ट्रेट आरोपी को अदालत के सामने लाने के लिए वारंट या समन जारी करता है, ज़मानतदार को मुक्त करता है, और आरोपी से कोई दूसरा पर्याप्त ज़मानतदार लाने को कहता है। अगर आरोपी ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे हिरासत में भेजा जा सकता है।
यह तब काम आता है जब ज़मानतदार का आरोपी से संपर्क टूट गया हो, परिवार से अनबन हो गई हो, या वह कहीं और जा रहा हो। बस ध्यान रखना छोड़ देने के बजाय औपचारिक रूप से मुक्ति माँगना कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।
परिवारों और ज़मानतदारों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- ज़मानतदार जुटाने से पहले जमानत आदेश ध्यान से पढ़ें: रकम, ज़मानतदारों की संख्या, और यह शर्त कि ज़मानतदार स्थानीय या रिश्तेदार होना चाहिए।
- जिस दिन बॉन्ड भरने हों, उस दिन सभी कागज़ों के मूल और फ़ोटोकॉपी तैयार रखें।
- सिर्फ़ उसी के ज़मानतदार बनें जिस पर आपको भरोसा हो और जिससे आप संपर्क में रह सकें।
- पक्का करें कि आरोपी हर सुनवाई पर हाज़िर हो। तारीख छूटने पर वारंट जारी हो सकता है, और कुछ मामलों में उद्घोषणा (proclamation) भी, साथ ही ज़मानतदार के खिलाफ़ ज़ब्ती की कार्यवाही भी।
- बॉन्ड और उसे स्वीकार करने वाले आदेश की एक प्रति अपने पास रखें।
गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है, इसकी विस्तृत जानकारी के लिए हमारा पिछला लेख BNSS के तहत नियमित जमानत कैसे काम करती है देखें, और गुरुग्राम में आपराधिक मामलों की सामान्य जानकारी भी।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-jamanat-mil-gaee-par-zamanatadar-nahin-mil-raha-bnss-ke-tahat-bel-bond-aur-za
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.