कई व्यावसायिक समझौतों, लोन दस्तावेज़ों, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट और साझेदारी विलेखों में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) क्लॉज़ होता है। इसका मतलब है कि विवाद का फ़ैसला सामान्य अदालत के बजाय मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) करता है, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत। यह प्रक्रिया तेज़ हो सकती है, लेकिन इसके अपने सख़्त नियम और समय-सीमाएँ हैं।
मुख्य चरण
- मध्यस्थता शुरू करने का नोटिस (धारा 21): इससे मध्यस्थता औपचारिक रूप से शुरू होती है।
- मध्यस्थ की नियुक्ति: आपसी सहमति से, या दूसरा पक्ष सहयोग न करे तो धारा 11 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा।
- अंतरिम सुरक्षा: धारा 9 के तहत अदालत से (मध्यस्थता से पहले, दौरान या बाद में) या धारा 17 के तहत मध्यस्थ न्यायाधिकरण से, जैसे पैसा सुरक्षित करने या संपत्ति बेचे जाने से रोकने के लिए।
- कार्यवाही और अवॉर्ड: दलीलें, सबूत और बहस; अवॉर्ड आमतौर पर धारा 29A में तय समय के भीतर दिया जाना होता है।
अवॉर्ड के बाद
- चुनौती: धारा 34 के तहत सीमित आधारों पर, अवॉर्ड मिलने के तीन महीने के भीतर (पर्याप्त कारण होने पर केवल 30 दिन और बढ़ सकते हैं)।
- लागू कराना: चुनौती की अवधि खत्म होने या चुनौती विफल होने पर, अवॉर्ड धारा 36 के तहत अदालत की डिक्री की तरह लागू कराया जाता है।
- अपील: धारा 37 के तहत सीमित अपील होती है।
क्लॉज़ होने के बावजूद अदालत में मुकदमा हो जाए तो
अगर आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने के बावजूद दूसरा पक्ष मुकदमा दायर कर दे, तो धारा 8 के तहत अदालत से पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजने का आवेदन किया जा सकता है। यह विवाद के मूल विषय पर पहला बयान दाखिल करने से पहले करना होता है।
इसमें किस तरह सहायता मिल सकती है
आर्बिट्रेशन क्लॉज़ और रणनीति पर सलाह, मध्यस्थता शुरू करना, तुरंत अंतरिम राहत माँगना, मध्यस्थ न्यायाधिकरण के समक्ष प्रतिनिधित्व, और अवॉर्ड की चुनौती व उसे लागू कराने का काम किया जाता है।