कौन क्या विरासत में पाएगा, और किस आधार पर, ये प्रश्न अक्सर परिवार के लिए कठिन समय में उठते हैं। दस्तावेज़ सही होना, और यह जानना कि कौन-सा कानून लागू होता है, कई विवादों को रोकता है और बाकी को जल्दी सुलझाता है।
वसीयत बनाना
- वसीयत लिखित होनी चाहिए, बनाने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए, और दो गवाहों द्वारा सत्यापित होनी चाहिए जो उसे हस्ताक्षर करते देखें।
- पंजीकरण वैकल्पिक है, लेकिन पंजीकृत वसीयत को चुनौती देना आमतौर पर कठिन होता है।
- वसीयत जीवनकाल में कभी भी बदली या रद्द की जा सकती है; आख़िरी वैध वसीयत ही मान्य होती है।
- बेहतर है कि गवाह वसीयत के लाभार्थी न हों।
जब वसीयत न हो
संपत्ति मृतक पर लागू व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून के अनुसार जाती है, जैसे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925। 2005 के संशोधन के बाद से हिन्दू संयुक्त परिवार (सहदायिकी) संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार हैं।
परिवार को जिन दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ सकती है
- उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र (सक्सेशन सर्टिफ़िकेट): मृतक के कर्ज़, बैंक जमा, शेयर और ऐसी चल संपत्ति लेने के लिए।
- प्रोबेट: वसीयत की अदालत द्वारा पुष्टि, जो कुछ मामलों में ज़रूरी है और अक्सर बैंक व प्राधिकरण इसे माँगते हैं।
- प्रशासन पत्र (लेटर्स ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन): जहाँ वसीयत है लेकिन निष्पादक नहीं, या कुछ मामलों में वसीयत ही नहीं है।
- वारिसों के नाम ज़मीन और संपत्ति के रिकॉर्ड का इंतक़ाल (म्यूटेशन)।
विवाद
- जालसाज़ी, अनुचित प्रभाव या स्वस्थ मानसिक स्थिति न होने जैसे आधारों पर वसीयत को चुनौती
- विरासत में मिली संपत्ति के बँटवारे के मुकदमे
- विवाद लंबित रहते हुए बिक्री या हस्तांतरण रोकने के लिए निषेधाज्ञा
इसमें किस तरह सहायता मिल सकती है
वसीयत तैयार की जाती है, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र और प्रोबेट प्राप्त किए जाते हैं, और सिविल अदालतों में विरासत व बँटवारे के विवादों में परिवारों का प्रतिनिधित्व किया जाता है।