स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम, 1985 के मामलों में भारी सज़ा और जमानत की सख़्त शर्तें होती हैं। साथ ही, यह अधिनियम तलाशी, ज़ब्ती और सैंपल लेने की विस्तृत प्रक्रिया तय करता है, और उसका पालन न होने से अभियोजन पक्ष का मामला काफ़ी कमज़ोर हो सकता है।
मात्रा ही लगभग सब कुछ तय करती है
सज़ा और जमानत मुख्य रूप से इस पर निर्भर करती है कि बरामद मात्रा कम (small), मध्यम (intermediate) या व्यावसायिक (commercial) है, जैसा कि सरकार ने हर पदार्थ के लिए अधिसूचित किया है।
- कम मात्रा के मामलों में सज़ा हल्की होती है, और जमानत आमतौर पर आसानी से मिलती है।
- व्यावसायिक मात्रा में धारा 37 जमानत पर रोक लगाती है: अदालत को संतुष्ट होना होता है कि यह मानने के उचित आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए अपराध करने की संभावना नहीं है।
पुलिस को जिस प्रक्रिया का पालन करना होता है
- धारा 50: व्यक्तिगत तलाशी से पहले व्यक्ति को बताना होता है कि उसे राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के सामने तलाशी का अधिकार है।
- धारा 42: सूचना दर्ज करने और बिना वारंट परिसर की तलाशी के नियम।
- धारा 52A: ज़ब्त पदार्थों की सूची बनाई जानी चाहिए और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सैंपल लिए जाने चाहिए।
- स्वतंत्र गवाह, सैंपल की कस्टडी की कड़ी और फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट, सबकी ट्रायल में बारीकी से जाँच होती है।
डिफ़ॉल्ट जमानत
ज़्यादातर NDPS अपराधों में जाँच की अवधि 180 दिन है, जिसे विशेष अदालत अभियोजक की रिपोर्ट पर एक साल तक बढ़ा सकती है। अगर समय पर चार्जशीट दाखिल न हो, तो आरोपी डिफ़ॉल्ट जमानत माँग सकता है।
इसमें किस तरह सहायता मिल सकती है
- विशेष अदालत और उच्च न्यायालय में जमानत आवेदन
- तलाशी, ज़ब्ती और सैंपलिंग के रिकॉर्ड की प्रक्रियात्मक कमियों के लिए जाँच
- पूरे ट्रायल में बचाव, अपील और सज़ा का निलंबन