कई बार सबसे ज़रूरी काम होता है किसी चीज़ को होने से रोकना: कोई आपकी संपत्ति पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा हो, विवादित ज़मीन पर निर्माण कर रहा हो, विवादित संपत्ति बेचने वाला हो, या किसी समझौते को तोड़ रहा हो। निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) अदालत का ऐसा आदेश है जो किसी व्यक्ति को कोई काम करने या न करने का निर्देश देता है।
निषेधाज्ञा के प्रकार
- अस्थायी (अंतरिम) निषेधाज्ञा: मुकदमा लंबित रहने के दौरान, सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 1 और 2 के तहत।
- एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा: ज़रूरी मामलों में दूसरे पक्ष को सुने बिना पहले ही दिन आदेश दिया जा सकता है (आदेश 39 नियम 3, CPC)।
- स्थायी निषेधाज्ञा: अंतिम फ़ैसले में, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 37 से 42 के तहत।
- यथास्थिति (स्टेटस को) आदेश: अगली तारीख तक दोनों पक्षों को चीज़ें जैसी हैं वैसी रखने का निर्देश।
अदालत क्या देखती है
- प्रथम दृष्टया मामला: एक वास्तविक, तर्कसंगत दावा।
- सुविधा का संतुलन: आदेश न देने से आपको, आदेश देने से दूसरे पक्ष को होने वाले नुकसान से ज़्यादा नुकसान होगा।
- अपूरणीय क्षति: ऐसा नुकसान जिसकी बाद में पैसे से पूरी भरपाई न हो सके।
जल्दी कदम उठाना ज़रूरी है
देरी निषेधाज्ञा के आवेदन के लिए घातक हो सकती है, क्योंकि अदालत पूछ सकती है कि आप पहले क्यों नहीं आए। अगर निर्माण शुरू हो गया है, बिक्री की तैयारी है, या कब्ज़े का खतरा है, तो तुरंत कदम उठाएँ। व्यावसायिक विवादों में तुरंत अंतरिम राहत के लिए अनिवार्य पूर्व-मुकदमा मध्यस्थता से गुज़रे बिना भी अदालत जाया जा सकता है।
ये दस्तावेज़ तैयार रखें
- स्वामित्व के दस्तावेज़, बैनामा (सेल डीड), अनुबंध या किराये के कागज़
- निर्माण, कब्ज़े या धमकी की तस्वीरें या वीडियो
- पहले से भेजे गए नोटिस, संदेश या पुलिस शिकायतें
इसमें किस तरह सहायता मिल सकती है
मुकदमा और निषेधाज्ञा का आवेदन जल्दी तैयार किया जाता है, ज़रूरत हो तो तुरंत सुनवाई माँगी जाती है, और अंतिम फ़ैसले तक प्रतिनिधित्व किया जाता है, जिसमें आदेश न माने जाने पर अवमानना की कार्यवाही भी शामिल है।