चेक बाउंस
गुरुग्राम में चेक बाउंस का लीगल नोटिस मिला? 15 दिनों का मतलब क्या है और आगे क्या करें
परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 का लीगल नोटिस आपको आपराधिक शिकायत दाखिल होने से पहले भुगतान के लिए 15 दिन देता है। नोटिस का मतलब, यह कैसे जाँचें कि नोटिस सही है, और इन 15 दिनों में आपके पास कौन-से व्यावहारिक विकल्प हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →किसी वकील के दफ़्तर से कूरियर या WhatsApp मैसेज आता है: आपका दिया हुआ चेक बाउंस हो गया है, और 15 दिन के अंदर रकम चुकाइए, नहीं तो आपके खिलाफ़ आपराधिक केस होगा। गुरुग्राम में बहुत-से लोगों को ज़िंदगी में पहली बार लीगल नोटिस इसी तरह मिलता है, और घबराहट होना स्वाभाविक है।
चेक बाउंस के कानून में यह नोटिस एक अहम कदम है, लेकिन यह न केस है, न समन, न गिरफ्तारी। यह एक चेतावनी है, और इसके बाद के 15 दिन वह समय है जब आगे क्या होगा, इस पर आपका सबसे ज़्यादा नियंत्रण होता है। यह लेख बताता है कि नोटिस का मतलब क्या है, उसे कैसे जाँचें, और आपके पास कौन-से विकल्प हैं।
किसी केस से पहले नोटिस क्यों आता है
पर्याप्त पैसे न होने पर (या बैंक के साथ तय सीमा से ज़्यादा होने पर) चेक का बाउंस होना परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत अपराध तभी बनता है जब ये कदम एक तय क्रम में पूरे हों:
- चेक उसकी वैधता अवधि के अंदर बैंक में लगाया जाए, जो आम तौर पर चेक पर लिखी तारीख से तीन महीने होती है।
- बैंक उसे बिना भुगतान के लौटा दे, और रिटर्न मेमो में कारण लिखे।
- चेक पाने वाला (payee) बैंक से बाउंस की जानकारी मिलने के 30 दिन के अंदर चेक जारी करने वाले (drawer, यानी जिसने चेक पर दस्तख़त किए) को लिखित माँग नोटिस भेजे।
- चेक जारी करने वाला नोटिस मिलने के 15 दिन के अंदर चेक की रकम न चुकाए।
15 दिन बिना भुगतान के बीत जाने पर ही अपराध पूरा होता है। इसके बाद चेक पाने वाले के पास मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दाखिल करने के लिए एक महीना होता है (धारा 142), हालाँकि देरी का पर्याप्त कारण हो तो अदालत देर से दाखिल शिकायत भी स्वीकार कर सकती है।
यानी यह नोटिस कानून का तरीका है जिससे चेक जारी करने वाले को भुगतान करने और आपराधिक केस से पूरी तरह बचने का एक आख़िरी मौका मिलता है।
कदम 1: नोटिस मिलने की तारीख नोट करें
15 दिन नोटिस मिलने की तारीख से गिने जाते हैं, उस पर लिखी तारीख से नहीं। लिफ़ाफ़ा, कूरियर की रसीद, या ईमेल या मैसेज आने के समय का स्क्रीनशॉट सँभालकर रखें। तारीख लिख लें। यह एक तथ्य आगे की हर बात के समय पर असर डालता है, आपके लिए भी और चेक पाने वाले के लिए भी।
लिफ़ाफ़ा लेने से मना करना या डाकिये से बचना काम नहीं आता। आपके सही पते पर भेजे गए नोटिस को अदालतें आम तौर पर तामील (served) मान लेती हैं, भले ही आपने उसे लेने से मना किया हो या आप घर पर न हों।
कदम 2: नोटिस को ध्यान से जाँचें
इन नोटिसों पर कानून सख़्त है, और छोटी-छोटी बातें मायने रखती हैं। अपने रिकॉर्ड के साथ नोटिस पढ़ें और जाँचें:
- चेक का विवरण: नंबर, तारीख, बैंक और रकम। क्या ये सही हैं, और क्या चेक सच में आपका है?
- माँगी गई रकम: नोटिस में चेक की रकम के भुगतान की माँग होनी चाहिए। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नोटिस में चेक की रकम से अलग रकम माँगी गई है, तो वह धारा 138 की शर्त पूरी नहीं करता, भले ही यह फ़र्क टाइपिंग की गलती से हो। नोटिस में ब्याज या खर्च अलग से लिखे जा सकते हैं, लेकिन चेक की रकम अपने-आप में साफ़ होनी चाहिए।
- तारीखें: चेक कब लगाया गया, कब लौटा, और नोटिस कब भेजा गया। क्या नोटिस बैंक की जानकारी के 30 दिन के अंदर भेजा गया?
- चेक लौटने का कारण: "funds insufficient" और "exceeds arrangement" सीधे धारा 138 के दायरे में आते हैं। दूसरे कारण, जैसे "payment stopped by drawer" या "account closed", को भी अदालतों ने कई स्थितियों में इसके दायरे में माना है, इसलिए यह न मानें कि ये अपने-आप में बचाव हैं।
नोटिस में कमियों से असली कर्ज़ ख़त्म नहीं हो जाता, और पैसे के लिए दीवानी दावा फिर भी हो सकता है। लेकिन अगर बाद में आपराधिक शिकायत दाखिल होती है, तो ये कमियाँ बहुत मायने रख सकती हैं।
कदम 3: पता करें कि आप असल में कितना देनदार हैं
चेक से जुड़ी हर चीज़ इकट्ठा करें: अनुबंध या बिल, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान की रसीदें, मैसेज और ईमेल। फिर ईमानदारी से सोचें कि आप इनमें से किस स्थिति में हैं:
- आप पैसे देनदार हैं और चुका सकते हैं। 15 दिन के अंदर चेक की रकम चुका देना सबसे सीधा रास्ता है। तब उस चेक के लिए धारा 138 के तहत कोई अपराध बनता ही नहीं।
- आप पैसे देनदार हैं, लेकिन अभी पूरी रकम नहीं चुका सकते। ऐसा अक्सर होता है। आप चेक पाने वाले को समझौते या किस्तों का प्रस्ताव दे सकते हैं।
- आप कर्ज़ से इनकार करते हैं। जैसे, चेक सिर्फ़ सिक्योरिटी के तौर पर दिया गया था, रकम पहले ही चुका दी गई थी, या चेक का गलत इस्तेमाल हुआ या आपकी सहमति के बिना भरा गया।
कदम 4: भुगतान कर रहे हैं, तो ऐसे करें जिसे साबित कर सकें
भुगतान चेक पाने वाले को ही करें, नोटिस में बताए तरीके से या ऐसे तरीके से जिसका रिकॉर्ड रहे, जैसे बैंक ट्रांसफ़र या डिमांड ड्राफ़्ट। लेन-देन का सबूत रखें। लिखित पावती (acknowledgement) लें कि यह भुगतान चेक की पूरी अदायगी में है, और हो सके तो मूल चेक वापस माँग लें।
बिना दस्तख़त वाली रसीद के नकद भुगतान से बचें। जिस भुगतान को आप साबित न कर सकें, वह बाद में ज़्यादा काम नहीं आता।
कदम 5: समय चाहिए, तो समझौता लिखित में करें
चेक के बहुत-से विवाद इसी चरण पर, किसी केस से पहले, सुलझ जाते हैं। अगर आप चेक पाने वाले के साथ किस्तों पर सहमत होते हैं, तो उसे दोनों पक्षों के दस्तख़त वाले लिखित समझौते में दर्ज करें, जिसमें रकम, तारीखें और किस्त छूटने पर क्या होगा, यह लिखा हो, और यह भी कि किस्तें समय पर दी गईं तो कोई शिकायत दाखिल नहीं होगी।
ध्यान रखें कि 15 दिन की अवधि कानून ने तय की है। बाद में भुगतान का ज़ुबानी वादा चेक पाने वाले को शिकायत दाखिल करने से नहीं रोकता अगर 15 दिन में पैसा न आए, जब तक कि उसने लिखित में कुछ और न माना हो।
कदम 6: दावे से असहमत हैं, तो लिखित जवाब दें
कानून में नोटिस का जवाब देना ज़रूरी नहीं है, लेकिन अगर आप कर्ज़ से इनकार करते हैं तो 15 दिन के अंदर भेजा गया साफ़ लिखित जवाब अक्सर समझदारी होती है। इससे सबसे शुरुआती चरण में आपकी बात दर्ज हो जाती है, जैसे कि चेक सिक्योरिटी चेक था या रकम पहले ही चुका दी गई थी, और बाद में इसे अदालत में दिखाया जा सकता है।
जवाब तथ्यों पर आधारित और आपके दस्तावेज़ों से मेल खाता होना चाहिए। जो सच नहीं है उसे मानने से बचें, और ऐसे आरोप लगाने से भी बचें जिन्हें आप साबित न कर सकें। बहुत-से लोग इसे किसी अधिवक्ता से तैयार करवाते हैं। हमारा पेज धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामले कानून को और विस्तार से समझाता है।
15 दिन बीत जाएँ तो क्या होता है?
अगर भुगतान नहीं होता, तो चेक पाने वाला उस मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दाखिल कर सकता है जिसके क्षेत्राधिकार में वह बैंक शाखा है जहाँ चेक लगाया गया था। अगर अदालत समन जारी करती है, तो केस उन चरणों से गुज़रता है जो हमारे पिछले लेख चेक बाउंस की शिकायत दाखिल होने के बाद क्या होता है में बताए गए हैं।
तब भी मामला सुलझ सकता है: धारा 138 के अपराध किसी भी चरण में समझौते योग्य (compoundable) हैं (धारा 147)। लेकिन बाद में समझौता आम तौर पर ज़्यादा महँगा पड़ता है, क्योंकि अदालत खर्च (costs) लगा सकती है और आपको चेक की रकम के 20% तक अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश हो सकता है (धारा 143A)। दोषी ठहराए जाने पर कानून में दो साल तक की कैद, चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।
आम गलतियाँ जिनसे बचें
- नोटिस को यह सोचकर नज़रअंदाज़ करना कि "यह तो बस एक चिट्ठी है"।
- नोटिस मिलने की तारीख का ध्यान न रखना।
- बिना रसीद के नकद भुगतान करना, या किसी तीसरे व्यक्ति को भुगतान करना।
- ज़्यादा समय के ज़ुबानी वादे पर भरोसा करना।
- गुस्से में या गलत जवाब भेजना जो आपके अपने दस्तावेज़ों से मेल न खाए।
- नतीजे समझे बिना आगे के चेकों का भुगतान रुकवा देना।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-chek-bauns-ka-ligal-notis-mila-15-dinon-ka-matalab-kya-hai-aur-aage-kya-karen
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.