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साइबर क्राइम

गुरुग्राम में "डिजिटल अरेस्ट" का कॉल आया? यह हमेशा धोखा क्यों है और अभी क्या करें

पुलिस, CBI या कस्टम्स का अधिकारी बनकर कोई कहता है कि आप "डिजिटल अरेस्ट" में हैं, वीडियो कॉल पर बने रहें और पैसे ट्रांसफ़र करें। भारतीय कानून में ऐसी कोई चीज़ नहीं है। इस धोखे को कैसे पहचानें, कॉल के दौरान और बाद में क्या करें, और कानून इसे कैसे देखता है।

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कॉल अक्सर बड़ी शालीनता से शुरू होता है। कोई कहता है कि आपके नाम का एक पार्सल ड्रग्स या नकली पासपोर्ट के साथ पकड़ा गया है, या आपका आधार नंबर किसी मनी-लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ा है। फिर कॉल किसी ऐसे व्यक्ति को "ट्रांसफ़र" किया जाता है जो खुद को पुलिस, CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED) या कस्टम्स का अधिकारी बताता है। कुछ ही देर में आप वीडियो कॉल पर होते हैं, सामने वर्दी में कोई व्यक्ति, पीछे सरकारी दफ़्तर जैसा माहौल, और आपसे कहा जाता है कि आप "डिजिटल अरेस्ट" में हैं: कॉल नहीं काटना है, किसी को बताना नहीं है, और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए पैसे किसी "वेरिफ़िकेशन" या "RBI सेफ़" खाते में ट्रांसफ़र करने हैं।

गुरुग्राम और पूरे हरियाणा में बहुत-से पढ़े-लिखे, समझदार लोग इस तरह अपनी बड़ी जमा-पूंजी गँवा चुके हैं। यह लेख सरल भाषा में बताता है कि ऐसा कॉल हमेशा धोखा क्यों होता है, कॉल चलते समय क्या करें, और उसके बाद क्या करें।

"डिजिटल अरेस्ट" नाम की कोई चीज़ नहीं होती

भारतीय आपराधिक कानून फ़ोन या वीडियो कॉल पर किसी गिरफ्तारी को मान्यता नहीं देता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS), जिसने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली है, के तहत गिरफ्तारी एक भौतिक कार्रवाई है जो पुलिस अधिकारी करता है, और इसके साथ तय सुरक्षा-उपाय जुड़े हैं: व्यक्ति को गिरफ्तारी का आधार बताया जाना चाहिए, उसके किसी रिश्तेदार या मित्र को सूचना दी जानी चाहिए, और उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। इनमें से कुछ भी वीडियो कॉल पर नहीं हो सकता।

असली जाँच एजेंसियाँ यह भी नहीं करतीं:

  • किसी व्यक्ति को घंटों या दिनों तक लगातार वीडियो कॉल पर रखना;
  • आपको परिवार या वकील से बात न करने का आदेश देना;
  • अपने पैसे "वेरिफ़ाई" करने या "नाम साफ़ करने" के लिए किसी खाते में पैसे ट्रांसफ़र करवाना;
  • WhatsApp या Skype पर अदालती सुनवाई करना, वारंट जारी करना या बयान दर्ज करना;
  • चैट पर तस्वीर के रूप में "गिरफ्तारी वारंट" या "फ्रीज़ ऑर्डर" भेजना।

जब पुलिस किसी व्यक्ति को जाँच में शामिल करना चाहती है, तो आम तौर पर पेश होने का लिखित नोटिस जारी करती है, जैसे धारा 35(3) BNSS (पहले धारा 41A CrPC) के तहत। ऐसा असली नोटिस कैसे काम करता है, यह हमने धारा 35(3) BNSS के तहत पुलिस नोटिस वाले लेख में समझाया है। असली नोटिस की पुष्टि उसमें लिखे थाने से, उसके सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नंबर पर, की जा सकती है।

इस धोखे को कैसे पहचानें

स्क्रिप्ट बदलती रहती है, लेकिन चेतावनी के संकेत लगभग हमेशा एक जैसे होते हैं:

  • डर और जल्दबाज़ी। आपसे कहा जाता है कि अगर आपने तुरंत सहयोग नहीं किया तो कुछ ही मिनटों में गिरफ्तारी हो जाएगी।
  • गोपनीयता। आपसे कहा जाता है कि मामला "गोपनीय" या "राष्ट्रीय सुरक्षा" से जुड़ा है और किसी को बताना अपराध है।
  • अकेला कर देना। आपसे कैमरा चालू रखकर कमरे में अकेले बैठने को कहा जाता है, कभी-कभी पूरी रात।
  • सरकारी दिखावा। स्क्रीन पर वर्दी, लोगो, नकली पहचान-पत्र, नकली अदालती आदेश और लेटरहेड दिखाए जाते हैं।
  • पैसों की माँग। देर-सबेर आपसे जमा-पूंजी ट्रांसफ़र करने, FD तुड़वाने या लोन लेने को कहा जाता है, इस वादे के साथ कि "वेरिफ़िकेशन के बाद" पैसा लौटा दिया जाएगा।

इनमें से कोई एक संकेत भी रुक जाने के लिए काफ़ी है। पैसों की माँग से तो बात पक्की हो जाती है: कोई भी वैध कानूनी प्रक्रिया आपसे किसी अनजान व्यक्ति के खाते में पैसे ट्रांसफ़र करने को नहीं कहती।

कॉल चलते समय क्या करें

  1. कॉल काट दें। आप कानूनी रूप से किसी कॉल पर बने रहने के लिए बाध्य नहीं हैं। कॉल काटना अपराध नहीं है और इसे आपके ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  2. कोई पैसा ट्रांसफ़र न करें, और OTP, बैंक विवरण, आधार या PAN की जानकारी साझा न करें, न ही कॉल करने वाले के कहने पर कोई ऐप इंस्टॉल करें।
  3. तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें: परिवार का सदस्य, मित्र या कोई अधिवक्ता। यह धोखा तभी तक चलता है जब तक आप अकेले हैं।
  4. ख़ुद पुष्टि करें। अगर आपको चिंता है कि सच में कोई केस हो सकता है, तो अपने स्थानीय थाने या संबंधित एजेंसी से उस नंबर पर संपर्क करें जो आपने ख़ुद उसके आधिकारिक स्रोत से निकाला हो, न कि कॉल करने वाले के दिए नंबर पर।
  5. अगर सुरक्षित रूप से कर सकें, तो कॉल करने वाले के नंबर, प्रोफ़ाइल, वीडियो कॉल की स्क्रीन और भेजे गए दस्तावेज़ों के स्क्रीनशॉट ले लें।

कॉल के बाद क्या करें

अगर आपका कोई पैसा नहीं गया

  • दूरसंचार विभाग के संचार साथी (Sanchar Saathi) पोर्टल पर चक्षु (Chakshu) सुविधा में उस नंबर और मैसेज की शिकायत करें। यह सुविधा संदिग्ध धोखाधड़ी वाले कॉल और मैसेज की रिपोर्ट करने के लिए है।
  • आप cybercrime.gov.in पर भी इसकी रिपोर्ट कर सकते हैं।
  • नंबर ब्लॉक करें, और परिवार के बुज़ुर्गों को सावधान करें, क्योंकि अक्सर उन्हीं को निशाना बनाया जाता है।

अगर आपने पैसे ट्रांसफ़र कर दिए

इसे आपात स्थिति मानें। कदम वही हैं जो किसी भी ऑनलाइन धोखाधड़ी में होते हैं, और इन्हें हमने ऑनलाइन धोखाधड़ी में पैसा जाने के बाद पहले 24 घंटों में क्या करें वाले लेख में विस्तार से बताया है। संक्षेप में:

  1. राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें, लेन-देन का विवरण दें और पावती (acknowledgement) नंबर नोट कर लें।
  2. अपने बैंक के आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर या ऐप से बैंक को सूचना दें।
  3. cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें और सबूत अपलोड करें।
  4. FIR दर्ज करवाएँ। धारा 173 BNSS के तहत यह किसी भी थाने में हो सकती है ("ज़ीरो FIR"), जिसमें गुरुग्राम के साइबर क्राइम थाने भी शामिल हैं।
  5. जो कोई फ़ीस लेकर पैसा "वापस दिलाने" की पेशकश करे, उसे भुगतान न करें। डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी के शिकार लोगों को अक्सर दूसरी बार भी निशाना बनाया जाता है।

शर्मिंदगी की वजह से देर न करें। ये धोखाधड़ियाँ संगठित गिरोह बहुत सोच-समझकर बनाई गई स्क्रिप्ट से चलाते हैं, और इनके झाँसे में आ जाना आपकी समझदारी के बारे में कुछ नहीं कहता। पैसे का पता न लग पाने और उसे रोका न जा सकने की मुख्य वजह देरी ही होती है।

"डिजिटल अरेस्ट" धोखाधड़ी में कौन-से अपराध बनते हैं?

भले ही "डिजिटल अरेस्ट" कोई कानूनी शब्द नहीं है, इसके पीछे का आचरण साफ़ तौर पर आपराधिक है। तथ्यों के अनुसार, पुलिस आम तौर पर इन प्रावधानों का इस्तेमाल करती है:

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 318: धोखाधड़ी (cheating) (पहले धारा 420 IPC);
  • धारा 319 BNS: प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी (cheating by personation), यानी कोई और बनकर, जैसे पुलिस या CBI अधिकारी बनकर, धोखा देना (पहले धारा 419 IPC);
  • धारा 308 BNS: जबरन वसूली (extortion), जहाँ किसी को डराकर पैसा लिया जाए (पहले धारा 384 IPC);
  • धारा 204 और 205 BNS: लोक सेवक (public servant) का प्रतिरूपण करना, और धोखा देने के लिए लोक सेवक की वर्दी पहनना या उसका प्रतीक-चिह्न रखना (पहले धारा 170 और 171 IPC);
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66C: पहचान की चोरी (identity theft); और
  • IT Act की धारा 66D: कंप्यूटर संसाधन का इस्तेमाल करके प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी।

इन मामलों की जाँच साइबर क्राइम पुलिस करती है। जहाँ धोखाधड़ी की कड़ी के खातों में पैसा रोक (hold) लिया गया हो, वहाँ पीड़ित बाद में नुकसान का सबूत देकर अदालत से उसकी रिहाई के लिए आवेदन कर सकता है।

जिनके खाते इस्तेमाल हुए, उनके लिए एक बात

इन धोखाधड़ियों में लिया गया पैसा तेज़ी से कई बैंक खातों से होकर गुज़ारा जाता है, जिनमें कुछ ऐसे लोगों के खाते भी होते हैं जिन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं होती। अगर ऐसा पैसा आपके खाते से गुज़रने की वजह से आपका खाता फ्रीज़ हो गया है, तो आपकी स्थिति पीड़ित से अलग है। ऐसी स्थिति कैसे संभाली जाती है, इसके लिए हमारा साइबर सेल द्वारा बैंक खाता फ्रीज़ वाला पेज देखें।

अधिवक्ता आशुतोष हंस अपनी स्थिति के बारे में कोई प्रश्न है? मामले की संक्षिप्त जानकारी और बात करने का सुविधाजनक समय बताएँ।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.