जमानत
गुरुग्राम में रहते हैं और किसी दूसरे राज्य में आपके खिलाफ़ FIR दर्ज हो गई? ट्रांज़िट अग्रिम जमानत कैसे काम करती है
अगर किसी दूसरे राज्य में आपके खिलाफ़ FIR दर्ज है, तो गुरुग्राम की अदालत या पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट गिरफ्तारी से सीमित, अंतरिम सुरक्षा दे सकते हैं। ट्रांज़िट अग्रिम जमानत कब मिल सकती है, सुप्रीम कोर्ट की शर्तें क्या हैं, और यह क्या कर सकती है और क्या नहीं।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →आप गुरुग्राम में रहते और काम करते हैं। एक दिन किसी दूसरे राज्य के पुलिस अधिकारी का फ़ोन आता है, या कोई रिश्तेदार बताता है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर आपके खिलाफ़ FIR दर्ज हो गई है, शायद किसी पुराने बिज़नेस पार्टनर, ग्राहक या अलग रह रहे पति या पत्नी ने कराई है। स्वाभाविक डर यही होता है कि उस राज्य की पुलिस आपके दरवाज़े पर आएगी और FIR देखने से पहले ही आपको ले जाएगी। ऐसी स्थिति में ट्रांज़िट अग्रिम जमानत (transit anticipatory bail) काम आती है। यह लेख बताता है कि यह क्या है, गुरुग्राम की अदालत या पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट इसे कब दे सकते हैं, और यह क्या कर सकती है और क्या नहीं।
"ट्रांज़िट अग्रिम जमानत" का मतलब क्या है
सामान्य अग्रिम जमानत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 (पहले धारा 438 CrPC) के तहत सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट देता है। आम तौर पर आवेदन उसी ज़िले या राज्य में किया जाता है जहाँ केस दर्ज है। (यह प्रक्रिया हमने गुरुग्राम में अग्रिम जमानत, चरण दर चरण वाले लेख में समझाई है।)
"ट्रांज़िट" अग्रिम जमानत कोई अलग धारा नहीं है। यह उस सीमित, अंतरिम सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है जो आपके रहने की जगह की अदालत किसी दूसरी जगह दर्ज केस के लिए देती है। इसका मकसद आपको इतना समय देना है कि आप रास्ते में गिरफ्तार हुए बिना उस अदालत तक पहुँच सकें जिसके क्षेत्र में FIR असल में आती है।
क्या गुरुग्राम की अदालत दूसरे राज्य की FIR से आपको बचा सकती है?
हाँ, लेकिन सिर्फ़ सीमित परिस्थितियों में। Priya Indoria v. State of Karnataka (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय के हित में हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, FIR दूसरे राज्य में दर्ज होने पर भी, सीमित अंतरिम अग्रिम जमानत दे सकते हैं। अदालत ने कहा कि इस शक्ति का इस्तेमाल सिर्फ़ असाधारण और मजबूर कर देने वाली परिस्थितियों में होना चाहिए, जहाँ सुरक्षा न देने से आवेदक को ऐसा नुकसान हो जिसकी भरपाई न हो सके।
इस शक्ति का दुरुपयोग न हो, इसके लिए अदालत ने कुछ शर्तें भी तय कीं। सरल शब्दों में:
- उस जगह से असली संबंध। आप जिस अदालत में जा रहे हैं, उसके क्षेत्र में आप सच में रहते हों, काम करते हों या अपना व्यवसाय या पेशा चलाते हों। सिर्फ़ आवेदन दाखिल करने के लिए गुरुग्राम आ जाना काफ़ी नहीं है।
- गिरफ्तारी का वास्तविक डर। आपके पास यह मानने का कारण हो, या तुरंत गिरफ्तारी की आशंका हो, कि आपको किसी गैर-ज़मानती (non-bailable) अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है।
- अभी स्थानीय अदालत क्यों नहीं जा सकते। आपको बताना होगा कि आप उस अदालत में तुरंत क्यों नहीं जा सकते जिसके क्षेत्र में केस है। सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण दिए, जैसे जान को तुरंत खतरा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरा, मनमानी कार्रवाई, या आपकी मेडिकल स्थिति या विकलांगता।
- दूसरे राज्य को सूचना। जिस राज्य में FIR दर्ज है, वहाँ के जाँच अधिकारी और सरकारी वकील (public prosecutor) को सुनवाई की पहली तारीख पर सूचना देनी होगी। उचित मामले में अदालत उसी दिन अंतरिम सुरक्षा दे सकती है।
- कारण सहित आदेश। अदालत को लिखना होगा कि वह सुरक्षा क्यों दे रही है, जिसमें यह भी शामिल है कि आपको दूसरे राज्य में गिरफ्तारी का डर क्यों है और इस सुरक्षा का जाँच पर क्या असर हो सकता है।
ट्रांज़िट सुरक्षा क्या करती है और क्या नहीं
इस राहत की सीमाएँ समझना ज़रूरी है।
- यह अस्थायी है। सुरक्षा आम तौर पर एक तय अवधि के लिए होती है, जो सक्षम अदालत तक पहुँचने के लिए काफ़ी हो। यह नियमित अग्रिम जमानत का विकल्प नहीं है।
- यह FIR को रद्द नहीं करती और न रोकती है। जाँच चलती रहती है। FIR रद्द करने (quashing) या पूरी अग्रिम जमानत का फ़ैसला सिर्फ़ उस राज्य की नियमित अदालतें, या उस राज्य का हाईकोर्ट ही कर सकता है।
- इसके साथ आम तौर पर शर्तें होती हैं। जैसे बुलाने पर जाँच में शामिल होना, देश न छोड़ना, और गवाहों से संपर्क न करना या उन्हें प्रभावित न करना।
- अवधि खत्म होते ही यह खत्म हो जाती है। अगर आप समय पर सक्षम अदालत नहीं पहुँचे, तो सुरक्षा समाप्त हो जाती है।
दूसरे राज्य में FIR का पता चले तो क्या करें
- शांत रहें और तथ्य जानें। थाना, FIR नंबर और लगाई गई धाराएँ पता करें। कई राज्य अपनी पुलिस वेबसाइट पर FIR डालते हैं, हालाँकि कुछ तरह की FIR अपलोड नहीं की जातीं।
- देखें कि अपराध ज़मानती हैं या नहीं। अगर सभी अपराध ज़मानती (bailable) हैं, तो जमानत आपका अधिकार है और आम तौर पर अग्रिम जमानत की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- देखें कि नोटिस आने की संभावना है या नहीं। सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस से आम तौर पर उम्मीद की जाती है कि सीधे गिरफ्तार करने के बजाय धारा 35(3) BNSS (पहले धारा 41A CrPC) के तहत पेश होने का नोटिस दे। ऐसा नोटिस मिले तो उसका पालन करना ज़रूरी है।
- अपने दस्तावेज़ इकट्ठा करें। गुरुग्राम में रहने या काम करने का सबूत, पहचान पत्र, और ऐसे कागज़ या मैसेज संभाल कर रखें जो विवाद में आपका पक्ष दिखाते हों।
- तय करें कि आवेदन कहाँ करना है। अगर आप बिना किसी असली खतरे के दूसरे राज्य जाकर वहाँ की अदालत में जा सकते हैं, तो आम तौर पर वही सही रास्ता है। अगर आप सच में तुरंत ऐसा नहीं कर सकते, तो गुरुग्राम में या पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अंतरिम सुरक्षा के आवेदन पर विचार किया जा सकता है।
- पुलिस से बचें नहीं। छिपना या फ़ोन बंद कर लेना बाद में आपके खिलाफ़ जा सकता है। कानूनी तरीकों से सहयोग करना हमेशा बेहतर है।
अगर दूसरे राज्य की पुलिस गिरफ्तार करने आ जाए
दूसरे राज्य की पुलिस गुरुग्राम में किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से गिरफ्तार कर सकती है। लेकिन हर गिरफ्तार व्यक्ति के बुनियादी अधिकार लागू रहते हैं, जैसे गिरफ्तारी के कारण बताया जाना, किसी रिश्तेदार या दोस्त को सूचना दिया जाना, और 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना (संविधान का अनुच्छेद 22(2) और धारा 58 BNSS, पहले धारा 57 CrPC)। जब गिरफ्तारी केस की जगह से दूर होती है, तो आम तौर पर व्यक्ति को स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, जो तय करता है कि पुलिस को उसे दूसरे राज्य ले जाने दिया जाए या नहीं। ये अधिकार हमने BNSS के तहत हर गिरफ्तार व्यक्ति के 5 अधिकार वाले लेख में विस्तार से समझाए हैं।
आम गलतफ़हमियाँ
"ट्रांज़िट जमानत का मतलब है कि मुझे दूसरे राज्य कभी नहीं जाना पड़ेगा।"
नहीं। यह सिर्फ़ समय देती है। केस उसी राज्य की अदालतें और पुलिस देखेंगी जहाँ वह दर्ज है।
"मेरे पास की कोई भी अदालत इसे दे सकती है।"
अग्रिम जमानत देने की शक्ति सिर्फ़ सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट के पास है, और वह भी तभी जब उस अदालत के क्षेत्र से आपका असली संबंध हो।
"ट्रांज़िट सुरक्षा मिल गई, तो FIR कमज़ोर है।"
ज़रूरी नहीं। अदालत केस के गुण-दोष (merits) पर फ़ैसला नहीं कर रही होती। वह सिर्फ़ थोड़े समय के लिए आपकी स्वतंत्रता की रक्षा करती है ताकि आप सही अदालत तक पहुँच सकें।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-rahate-hain-aur-kisi-dusare-rajy-men-aapake-khilaf-fir-darj-ho-gaee-tranzit-a
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.