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निषेधाज्ञा

कोई आपकी संपत्ति पर निर्माण कर रहा है या उसे बेच रहा है? तुरंत स्टे (रोक) कैसे लें

जब विवादित ज़मीन पर अवैध निर्माण, कब्ज़े से बेदखली या विवादित संपत्ति की बिक्री होने वाली हो, तो दीवानी अदालत तुरंत निषेधाज्ञा (injunction) दे सकती है। यह कैसे काम करती है और अदालत क्या देखती है।

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संपत्ति के झगड़ों में सबसे ज़्यादा नुकसान अक्सर शुरुआत के कुछ दिनों में ही हो जाता है: विवादित ज़मीन पर दीवार खड़ी कर दी जाती है, परिवार का कोई सदस्य साझा प्लॉट बेच देता है, किरायेदार को ज़बरदस्ती निकाल दिया जाता है, या कोई कब्ज़ा कर लेता है। एक बार निर्माण पूरा हो जाए या संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को बिक जाए, तो उसे पलटने में सालों लग सकते हैं। निषेधाज्ञा (injunction), जिसे आम बोलचाल में स्टे ऑर्डर कहते हैं, इसे समय रहते रोकने का कानूनी तरीका है।

निषेधाज्ञा क्या करती है

निषेधाज्ञा अदालत का ऐसा आदेश है जो किसी व्यक्ति को कुछ करने का, या ज़्यादातर मामलों में कुछ करने से रुकने का निर्देश देता है। संपत्ति के मामलों में इसका इस्तेमाल होता है:

  • विवादित ज़मीन पर निर्माण रोकने के लिए;
  • कब्ज़े में बैठे व्यक्ति को बेदखल होने से बचाने के लिए;
  • विवादित संपत्ति की बिक्री, हस्तांतरण (transfer) या गिरवी (mortgage) पर रोक लगाने के लिए; या
  • मामले का फ़ैसला होने तक मौजूदा स्थिति (status quo) बनाए रखने के लिए।

अस्थायी और स्थायी निषेधाज्ञा

स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) मुकदमे के अंत में दी जाती है। क्योंकि मुकदमों में समय लगता है, इसलिए वादी (plaintiff) आमतौर पर साथ में सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXXIX, नियम 1 और 2 के तहत अस्थायी निषेधाज्ञा (temporary injunction) भी माँगता है, जो मुकदमा चलने के दौरान संपत्ति को सुरक्षित रखती है।

अदालत क्या देखती है

अदालतें तीन जाने-माने सवालों पर विचार करती हैं:

  1. प्रथम दृष्टया मामला (prima facie case): दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर, क्या कोई गंभीर सवाल है जिसका फ़ैसला आपके पक्ष में हो सकता है?
  2. सुविधा का संतुलन (balance of convenience): क्या निषेधाज्ञा न देने से आपको उससे ज़्यादा परेशानी होगी, जितनी उसे देने से दूसरे पक्ष को होगी?
  3. अपूरणीय क्षति (irreparable injury): क्या आपको ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई पैसे के मुआवज़े से ठीक तरह नहीं हो सकती?

अदालत यह भी उम्मीद करती है कि निषेधाज्ञा माँगने वाला व्यक्ति साफ़ नीयत (clean hands) से आए, सभी ज़रूरी तथ्य बताए, और बिना देरी के कदम उठाए।

बहुत ज़रूरी मामलों में एकपक्षीय (ex parte) आदेश

सामान्य तौर पर निषेधाज्ञा देने से पहले दूसरे पक्ष को नोटिस दिया जाता है। जहाँ देरी से निषेधाज्ञा का मकसद ही ख़त्म हो जाए, जैसे जब उसी हफ़्ते निर्माण हो रहा हो, वहाँ अदालत दूसरे पक्ष को पहले सुने बिना एकपक्षीय (ex parte) निषेधाज्ञा दे सकती है। CPC के आदेश XXXIX, नियम 3 के तहत अदालत को अपने कारण दर्ज करने होते हैं, और वादी को तुरंत दूसरे पक्ष को आवेदन और दस्तावेज़ों की कॉपी भेजनी होती है। इसके बाद अदालत को तीस दिन के भीतर आवेदन का निपटारा करने की कोशिश करनी होती है।

कौन-से दस्तावेज़ इकट्ठा करें

  • मालिकाना हक़ के दस्तावेज़: बैनामा (sale deed), वसीयत, बँटवारा-पत्र (partition deed) या आवंटन पत्र (allotment letter)
  • राजस्व रिकॉर्ड: जमाबंदी, इंतकाल (mutation) की प्रविष्टियाँ और साइट प्लान
  • कब्ज़े का सबूत: बिजली और पानी के बिल, प्रॉपर्टी टैक्स की रसीदें, फ़ोटो
  • होने वाली कार्रवाई का सबूत: निर्माण की तारीख़ वाली फ़ोटो या वीडियो, नोटिस, मैसेज या बिक्री के विज्ञापन

लगता है दूसरा पक्ष पहले अदालत जाएगा? कैविएट दायर करें

अगर आपको लगता है कि कोई आपके खिलाफ निषेधाज्ञा के लिए अदालत जा सकता है, तो आप धारा 148A CPC के तहत कैविएट (caveat) दायर कर सकते हैं। तब अदालत को उनके आवेदन पर कोई भी आदेश देने से पहले आपको नोटिस देना होगा। कैविएट नब्बे दिन तक लागू रहता है।

निषेधाज्ञा का उल्लंघन

निषेधाज्ञा न मानने के नतीजे होते हैं। CPC के आदेश XXXIX, नियम 2A के तहत अदालत उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की संपत्ति कुर्क (attach) करने और उसे सिविल हिरासत (civil detention) में भेजने का आदेश दे सकती है।

अधिवक्ता आशुतोष हंस अपनी स्थिति के बारे में कोई प्रश्न है? मामले की संक्षिप्त जानकारी और बात करने का सुविधाजनक समय बताएँ।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.