साइबर क्राइम
OTP शेयर करने के बाद साइबर धोखाधड़ी में पैसा गया? कब बैंक को फिर भी पैसा लौटाना पड़ सकता है
ज़्यादातर लोग मानते हैं कि OTP शेयर कर दिया तो बैंक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। केरल हाईकोर्ट के हाल के फ़ैसले में SBI को साइबर धोखाधड़ी की शिकार ग्राहक को ₹3.73 लाख लौटाने का निर्देश दिया गया। अदालत ने क्या कहा, RBI के नियम क्या हैं, और ऐसा हो तो क्या करें।
"आपने OTP शेयर किया, इसलिए गलती आपकी है।" साइबर धोखाधड़ी के शिकार लोग बैंक से यह बात अक्सर सुनते हैं, और ज़्यादातर इसे मान भी लेते हैं। 19 अक्टूबर 2026 को रिपोर्ट हुआ एक फ़ैसला बताता है कि जवाब हमेशा इतना सीधा नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को एक ग्राहक को ₹3.73 लाख लौटाने का निर्देश दिया, जिसने धोखेबाज़ के साथ OTP शेयर करने के बाद यह पैसा गंवाया था, क्योंकि बैंक यह साबित नहीं कर सका कि वह ग्राहक धोखाधड़ी में शामिल थी।
मामले में क्या हुआ
रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहक को SMS मिला कि उनका पुराना, बिना चिप वाला डेबिट कार्ड ब्लॉक हो जाएगा और उसे ऑनलाइन दोबारा चालू किया जा सकता है। उसी नंबर से कॉल आया और कार्ड चालू करने के नाम पर "State Bank Secure App" रजिस्टर करने के लिए OTP माँगे गए। उन्होंने OTP बता दिए। कुछ ही देर में उनके बचत खाते से लगभग ₹3.73 लाख निकल गए।
उन्होंने उसी दिन बैंक के कस्टमर केयर को सूचना दी, उनकी इंटरनेट बैंकिंग ब्लॉक कर दी गई, और उन्होंने शाखा और पुलिस में भी शिकायत की। पुलिस ने पैसा निकालने वाले व्यक्ति की पहचान भी कर ली। इसके बावजूद पैसा वापस नहीं मिला, और बैंकिंग लोकपाल (Ombudsman) ने यह कहकर शिकायत खारिज कर दी कि वह लेन-देन में शामिल थीं। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया (Remadevi T.L. v. Reserve Bank of India and Others, W.P.(C) No. 28970 of 2021, न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन)।
हाईकोर्ट ने क्या फ़ैसला दिया
- बैंक ने धोखाधड़ी कैसे हुई, इस बारे में ग्राहक के बयान पर विवाद नहीं किया, और पुलिस रिपोर्ट ने भी उनका समर्थन किया।
- उन्होंने उसी दिन, तुरंत शिकायत की।
- बैंक यह साबित नहीं कर सका कि वह धोखाधड़ी वाले लेन-देन में शामिल थीं।
- इसलिए उनका मामला RBI के तीसरे पक्ष की गड़बड़ी (third-party breach) वाले "ज़ीरो लायबिलिटी" प्रावधान में आता है, न कि उस प्रावधान में जिसमें लापरवाह ग्राहक को नुकसान उठाना पड़ता है।
- अदालत ने यह भी कहा कि शिकायत के बाद बैंक ने रकम वापस खाते में नहीं डाली और पुलिस द्वारा धोखेबाज़ की पहचान हो जाने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाया।
अदालत ने लोकपाल का आदेश रद्द किया और SBI को चार हफ़्ते में नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया। अदालत ने 2024 के गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के एक मिलते-जुलते फ़ैसले पर भरोसा किया, जिसके खिलाफ़ बैंक की अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी।
फ़ैसले के पीछे RBI के नियम
मुख्य दस्तावेज़ RBI का 6 जुलाई 2017 का सर्कुलर है: "Customer Protection – Limiting Liability of Customers in Unauthorised Electronic Banking Transactions"। आसान शब्दों में:
- ज़ीरो लायबिलिटी (कोई ज़िम्मेदारी नहीं): जब धोखाधड़ी बैंक की अपनी गलती या कमी से हो, या जब यह तीसरे पक्ष की गड़बड़ी हो (गलती न बैंक की, न ग्राहक की) और ग्राहक बैंक के लेन-देन संबंधी मैसेज मिलने के तीन कामकाजी दिनों के भीतर बैंक को सूचित कर दे।
- सीमित ज़िम्मेदारी: अगर ग्राहक चार से सात कामकाजी दिनों में सूचना देता है, तो उसका नुकसान एक सीमा तक सीमित रहता है (ज़्यादातर बचत खातों में प्रति लेन-देन ₹10,000)।
- जब नुकसान ग्राहक की अपनी लापरवाही से हो, जैसे भुगतान की जानकारी शेयर करना, तो रिपोर्ट करने तक का नुकसान ग्राहक उठाता है। रिपोर्ट करने के बाद का नुकसान बैंक का होता है।
- बैंक को ग्राहक की शिकायत के 10 कामकाजी दिनों के भीतर विवादित रकम अस्थायी रूप से खाते में वापस डालनी होती है ("shadow reversal"), और शिकायत का निपटारा 90 दिनों के भीतर करना होता है।
- सबसे अहम बात: अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में ग्राहक की ज़िम्मेदारी साबित करने का भार बैंक पर है।
क्या इसका मतलब है कि हर OTP धोखाधड़ी में पैसा वापस मिलेगा?
नहीं। यही बात सबसे आसानी से गलत समझी जाती है। हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है। बैंक अक्सर कहते हैं कि OTP शेयर करना लापरवाही है, और कई मामलों में यह दलील मानी भी जाती है। केरल के मामले में ग्राहक के पक्ष में फ़ैसला इसलिए आया क्योंकि उन्होंने तुरंत शिकायत की, बैंक ने उनके बयान पर विवाद नहीं किया, पुलिस रिकॉर्ड ने उनका साथ दिया, और बैंक यह साबित नहीं कर सका कि वह धोखाधड़ी में शामिल थीं। जिन मामलों में पीड़ित खुद जानते-बूझते किसी को पैसे भेजता है, जैसे फ़र्ज़ी निवेश योजनाएँ या "डिजिटल अरेस्ट" कॉल, उन्हें आम तौर पर अलग तरह से देखा जाता है। बैंक इस फ़ैसले को चुनौती भी दे सकता है।
यह फ़ैसला इतना ज़रूर दिखाता है कि "आपने OTP शेयर किया" कहने से बात खत्म नहीं हो जाती। ग्राहक की ज़िम्मेदारी बैंक को साबित करनी होती है, और जो पीड़ित जल्दी कदम उठाता है, उसकी स्थिति कहीं मज़बूत होती है।
अगर आपके साथ ऐसा हो: ज़रूरी कदम
- तुरंत बैंक को सूचित करें, उसकी आधिकारिक हेल्पलाइन, ऐप या शाखा के ज़रिए, और लिखित शिकायत या रेफ़रेंस नंबर लें। तीन कामकाजी दिनों की समय-सीमा मायने रखती है।
- 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें, और पावती नंबर संभालकर रखें।
- हर सबूत संभालें: SMS, कॉल लॉग, कॉल करने वाले का नंबर, स्क्रीनशॉट और बैंक स्टेटमेंट।
- बैंक से लिखित में माँगें कि RBI सर्कुलर के तहत रकम का shadow reversal किया जाए और आपकी ज़िम्मेदारी पर लिखित फ़ैसला दिया जाए।
- अगर बैंक मना करे या जवाब न दे, तो RBI की एकीकृत लोकपाल योजना (Integrated Ombudsman Scheme) के तहत RBI लोकपाल के पास जा सकते हैं। वहाँ से राहत न मिले, तो उपभोक्ता आयोग या उपयुक्त मामलों में हाईकोर्ट के विकल्प हो सकते हैं।
पहले कदमों की विस्तृत जानकारी के लिए देखें: ऑनलाइन धोखाधड़ी में पैसा गया? पहले 24 घंटों में क्या करें। अगर धोखाधड़ी का पैसा आपके खाते से गुज़रने के कारण खाता फ्रीज़ हो गया है, तो देखें: साइबर पुलिस ने बैंक खाता फ्रीज़ कर दिया?
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/otp-sheyar-karane-ke-bad-saibar-dhokhadhari-men-paisa-gaya-kab-baink-ko-phir-bhi-paisa-lau
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.