आपराधिक प्रक्रिया
अदालत ने वारंट जारी किया या भगोड़ा (उद्घोषित अपराधी) घोषित कर दिया? इसका मतलब क्या है और BNSS के तहत क्या करें
गैर-जमानती वारंट या धारा 84 BNSS के तहत उद्घोषणा गंभीर बात है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में अदालत के सामने जल्दी पेश होकर इसका हल निकल सकता है। इन आदेशों का मतलब, गैरहाज़िर रहने पर क्या होता है, और आपके पास कौन-से व्यावहारिक कदम हैं।
बहुत-से लोगों को पहली बार पता तब चलता है कि उनका आपराधिक केस आगे बढ़ चुका है, जब पुलिस वारंट लेकर घर आ जाती है, या कोई पड़ोसी बताता है कि गेट पर उनके नाम का अदालती नोटिस चिपका है। कुछ लोगों को तब पता चलता है जब उनका बैंक खाता या संपत्ति कुर्क (attach) हो जाती है। वारंट या "उद्घोषित अपराधी" (proclaimed offender) का आदेश सुनने में डरावना लगता है, और यह गंभीर भी है। लेकिन यह रास्ते का अंत नहीं है। ज़्यादातर मामलों में कानून स्थिति ठीक करने का साफ़ रास्ता देता है, बशर्ते आप जल्दी कदम उठाएँ और सही तरीके से अदालत के सामने पेश हों। यह लेख सरल भाषा में बताता है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत इन आदेशों का क्या मतलब है, और आपके पास कौन-से व्यावहारिक कदम हैं।
अदालत वारंट क्यों जारी करती है?
जब कोई आपराधिक केस अदालत में पहुँचता है, जैसे चार्जशीट दाखिल होने के बाद या किसी शिकायत केस पर संज्ञान लेने के बाद, तो अदालत आम तौर पर पहले आरोपी को समन (summons) से बुलाती है। अगर समन तामील नहीं होता, या व्यक्ति तय तारीख पर पेश नहीं होता, तो अदालत हाज़िरी पक्की करने के लिए सख़्त कदम उठा सकती है। आम कारण ये होते हैं:
- समन पुराने पते पर चला गया, और व्यक्ति को केस का पता ही नहीं चला।
- व्यक्ति को तारीख पता थी लेकिन वह पेश नहीं हुआ, कभी बीमारी, यात्रा या इस गलतफ़हमी की वजह से कि मामला "निपट" चुका है।
- जो आरोपी पहले से जमानत पर था, उसने बाद की तारीखों पर आना बंद कर दिया।
- अदालत को लगा कि व्यक्ति प्रक्रिया से बच रहा है।
समन वाले चरण के बारे में ज़्यादा जानकारी हमारे पिछले लेख चार्जशीट दाखिल होने के बाद क्या होता है में है।
जमानती वारंट और गैर-जमानती वारंट: फ़र्क क्या है
जमानती वारंट (bailable warrant)
जमानती वारंट पुलिस को व्यक्ति को अदालत में लाने का निर्देश देता है, लेकिन इसमें व्यक्ति को बॉन्ड देकर, ज़मानतदारों (sureties) के साथ या उनके बिना, छोड़ा जा सकता है, इस वचन पर कि वह तय तारीख पर अदालत में पेश होगा। इसका मकसद हाज़िरी पक्की करना है, किसी को हिरासत में रखना नहीं।
गैर-जमानती वारंट (non-bailable warrant, NBW)
गैर-जमानती वारंट पुलिस को व्यक्ति को गिरफ्तार करके अदालत के सामने पेश करने का निर्देश है। पुलिस अपनी ओर से व्यक्ति को नहीं छोड़ सकती; पेश किए जाने के बाद जमानत देनी है या नहीं, यह अदालत तय करती है। अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे NBW तभी जारी करें जब यह सोच लें कि समन या जमानती वारंट काफ़ी होगा या नहीं, लेकिन व्यवहार में बार-बार पेश न होने पर अक्सर NBW जारी हो जाता है।
वारंट आम तौर पर तब तक लागू रहता है जब तक अदालत उसे रद्द न कर दे या उसकी तामील न हो जाए। सिर्फ़ समय बीत जाने से वह खत्म नहीं होता।
उद्घोषणा क्या है, और "उद्घोषित व्यक्ति" कौन है?
अगर अदालत के पास यह मानने का कारण हो कि जिस व्यक्ति के खिलाफ़ वारंट जारी हुआ है, वह फ़रार है या खुद को छिपा रहा है ताकि वारंट की तामील न हो सके, तो वह धारा 84 BNSS (पहले धारा 82 CrPC) के तहत लिखित उद्घोषणा (proclamation) जारी कर सकती है। उद्घोषणा में व्यक्ति को एक तय जगह और समय पर पेश होने को कहा जाता है, जो उसके प्रकाशन की तारीख से कम से कम तीस दिन बाद का होता है। आम तौर पर इसे व्यक्ति के रहने वाले इलाके में सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाता है, उसके घर या गाँव/कस्बे की किसी प्रमुख जगह पर चिपकाया जाता है, और अदालत परिसर में लगाया जाता है। अदालत इसे अख़बार में छपवाने का निर्देश भी दे सकती है।
अगर व्यक्ति फिर भी पेश नहीं होता, तो अदालत, जैसी उचित समझे वैसी जाँच के बाद, उसे उद्घोषित व्यक्ति (proclaimed person) घोषित कर सकती है। अगर केस कुछ गंभीर अपराधों से जुड़ा है, जिनमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत दस साल या उससे ज़्यादा की कैद, उम्रकैद या मौत की सज़ा वाले अपराध शामिल हैं, तो धारा 84(4) BNSS के तहत उसे उद्घोषित अपराधी (proclaimed offender) घोषित किया जा सकता है। आम बोलचाल में इसे "भगोड़ा घोषित करना" कहा जाता है।
उद्घोषणा के बाद क्या होता है?
संपत्ति की कुर्की
धारा 85 BNSS (पहले धारा 83 CrPC) के तहत अदालत, लिखित कारण दर्ज करके, उद्घोषित व्यक्ति की चल या अचल संपत्ति कुर्क करने का आदेश दे सकती है। चल संपत्ति ज़ब्त की जा सकती है या रिसीवर को सौंपी जा सकती है, और अचल संपत्ति कब्ज़ा लेकर, रिसीवर नियुक्त करके या किराए का भुगतान रोककर कुर्क की जा सकती है। अगर अदालत को लगे कि व्यक्ति अपनी संपत्ति बेचने या हटाने वाला है, तो वह उद्घोषणा के साथ ही कुर्की का आदेश दे सकती है। BNSS में कुर्क संपत्ति में हित रखने वाले दूसरे लोगों के दावों, और तय समय में पेश होकर पर्याप्त कारण बताने वाले व्यक्ति को संपत्ति वापस करने के प्रावधान भी हैं।
एक अलग आपराधिक मामला
उद्घोषणा के जवाब में पेश न होना अपने आप में धारा 209 BNS (पहले धारा 174A IPC) के तहत अपराध है। इसकी सज़ा तीन साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा (community service) है। अगर व्यक्ति को धारा 84(4) BNSS के तहत उद्घोषित अपराधी घोषित किया गया है, तो सज़ा सात साल तक की कैद और जुर्माना हो सकती है। यानी मूल केस के साथ-साथ व्यक्ति पर एक नया केस भी बन सकता है।
गैरमौजूदगी में ट्रायल
BNSS में एक नया प्रावधान, धारा 356, जोड़ा गया है, जिसके तहत अदालत ट्रायल से बचने के लिए फ़रार उद्घोषित अपराधी का ट्रायल, कुछ सुरक्षा-उपायों के साथ, उसकी गैरमौजूदगी में चला सकती है। दूसरी शर्तों के साथ, ऐसा ट्रायल आरोप तय (charges framed) होने के नब्बे दिन बाद ही शुरू हो सकता है, और उद्घोषित अपराधी ऐसे फ़ैसले के खिलाफ़ तब तक अपील नहीं कर सकता जब तक वह अपील अदालत के सामने खुद पेश न हो।
अग्रिम जमानत पर असर
अदालतों का मत रहा है कि जिस व्यक्ति को उद्घोषित अपराधी घोषित कर दिया गया है, वह आम तौर पर अग्रिम जमानत (anticipatory bail) का हकदार नहीं होता, सिवाय दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों के। इसलिए उद्घोषणा जारी होने तक इंतज़ार करने से आपके विकल्प काफ़ी कम हो जाते हैं।
अगर आपके खिलाफ़ वारंट या उद्घोषणा जारी हो जाए तो क्या करें
- सही जानकारी निकालें। अदालत, केस नंबर, अपराध की धाराएँ और अगली तारीख नोट करें। अक्सर आदेश eCourts सेवाओं की वेबसाइट या ऐप पर केस नंबर, FIR नंबर या अपने नाम से देखा जा सकता है, या संबंधित अदालत से उसकी प्रमाणित प्रति (certified copy) ली जा सकती है।
- छिपें नहीं, देर न करें। हर छूटी तारीख के साथ अदालत की सहानुभूति कम होती जाती है, और लगातार गैरहाज़िरी से कुर्की और धारा 209 BNS के तहत अलग केस हो सकता है।
- वकील के ज़रिए वारंट जारी करने वाली अदालत के सामने पेश हों। आम तरीका यह है कि उसी अदालत के सामने पेश होकर वारंट रद्द करने या वापस लेने (cancel/recall) की अर्ज़ी दी जाए, जिसमें पेश न हो पाने का कारण सहायक दस्तावेज़ों के साथ बताया जाए, जैसे पता बदलने का सबूत, मेडिकल रिकॉर्ड या यात्रा के दस्तावेज़। उचित मामलों में अदालत पेशी और नए बॉन्ड पर वारंट रद्द कर सकती है, या व्यक्ति को हिरासत में लेकर फिर जमानत पर विचार कर सकती है।
- अगर आप जमानत पर हैं और वारंट तारीखें छूटने से जारी हुआ है, तो अदालत यह भी देख सकती है कि आपका जमानत बॉन्ड ज़ब्त (forfeit) किया जाए या नहीं। यहाँ सच्चा कारण बताना और जल्दी पेश होना आम तौर पर बहुत मायने रखता है।
- अगर संपत्ति कुर्क हो चुकी है, तो BNSS के संपत्ति वापसी वाले प्रावधानों के तहत संपत्ति छुड़ाने की दिशा में पहला कदम आम तौर पर अदालत के सामने पेश होना ही है।
- अगर आदेश खुद कानूनी रूप से दोषपूर्ण है, जैसे वारंट की सही तामील के बिना, अदालत द्वारा अपनी संतुष्टि दर्ज किए बिना, या ज़रूरी तीस दिन की अवधि दिए बिना उद्घोषणा जारी की गई, तो उसे संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है (पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के मामलों में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट)। अगर मूल FIR ही बेबुनियाद है, तो उसे रद्द (quash) कराने पर भी विचार किया जा सकता है; देखें हमारा पेज आपराधिक मामले।
इन आम गलतियों से बचें
- यह मान लेना कि समझौते से केस खत्म हो गया। शिकायतकर्ता के साथ निजी समझौता अपने आप में अदालत में चल रहा केस बंद नहीं करता। जब तक अदालत आदेश न दे, आपको पेश होते रहना होगा।
- चिपकाए गए नोटिस को नज़रअंदाज़ करना। गेट पर चिपकी या अख़बार में छपी उद्घोषणा एक औपचारिक अदालती प्रक्रिया है, कोई धमकी नहीं जिसे अनदेखा किया जाए।
- अपना पता अपडेट न करना। अगर केस चलते हुए आप घर बदलते हैं, तो अपने वकील के ज़रिए अदालत को बताएँ ताकि नोटिस आप तक पहुँचें।
- किसी और की बात पर भरोसा करना। पुलिस, शिकायतकर्ता या किसी रिश्तेदार की बात पर निर्भर रहने के बजाय अदालत का अपना रिकॉर्ड देखें।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-ki-adalat-ne-varant-jari-kiya-ya-bhagora-udghoshit-aparadhi-ghoshit-kar-diya-isak
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.