आपराधिक प्रक्रिया
गुरुग्राम में धारा 35(3) BNSS का पुलिस नोटिस मिला है? इसका मतलब क्या है और क्या करें
BNSS की धारा 35(3) (पहले धारा 41A CrPC) के तहत पेश होने का नोटिस गिरफ्तारी नहीं है, लेकिन आप उसका जवाब कैसे देते हैं, यह बहुत मायने रखता है। नोटिस का मतलब, आपके अधिकार, और थाने जाने से पहले उठाने वाले कदम।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →कोई पुलिस अधिकारी आपके घर आता है या फ़ोन करता है, और एक काग़ज़ देता है जिसमें किसी FIR के सिलसिले में एक तय तारीख़ पर थाने में पेश होने को कहा गया है। ज़्यादातर लोगों के लिए यह डराने वाला होता है: क्या अब गिरफ्तारी होगी? क्या जाना चाहिए? क्या किसी को साथ ले जाना चाहिए?
ज़्यादातर मामलों में यह काग़ज़ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) के तहत पेश होने का नोटिस होता है, जिसने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41A की जगह ली है। सही तरह समझें तो यह आपके लिए एक सुरक्षा है, गिरफ्तारी की ओर कदम नहीं। लेकिन इसे सही ढंग से संभालना ज़रूरी है।
धारा 35(3) का नोटिस क्या है?
BNSS पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की इजाज़त सिर्फ़ सीमित हालात में देती है। जिन अपराधों में सज़ा सात साल तक की कैद है, उनमें अधिकारी को यह तसल्ली होनी चाहिए कि गिरफ्तारी सच में ज़रूरी है, जैसे आगे अपराध रोकने, सही जाँच सुनिश्चित करने, या सबूतों या गवाहों से छेड़छाड़ रोकने के लिए, और उसे इसके कारण लिखित में दर्ज करने होते हैं।
जहाँ गिरफ्तारी ज़रूरी नहीं है, वहाँ धारा 35(3) कहती है कि अधिकारी नोटिस जारी करेगा, जिसमें व्यक्ति को उसके सामने या किसी तय जगह पर पेश होने को कहा जाएगा। सीधे शब्दों में: कानून चाहता है कि आपको हिरासत में लेने के बजाय जाँच में शामिल होने को कहा जाए। ऐसे अपराधों के लिए अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि "नोटिस नियम है, गिरफ्तारी अपवाद"।
ऐसे नोटिस आमतौर पर धोखाधड़ी (cheating), आपराधिक विश्वासघात (criminal breach of trust), क्रूरता और दहेज से जुड़े आरोपों, चेक से जुड़े विवादों, ऑनलाइन धोखाधड़ी की शिकायतों और ऐसे कई अपराधों में जारी होते हैं जिनमें सज़ा सात साल या उससे कम है।
क्या नोटिस का मतलब गिरफ्तारी है?
नहीं। नोटिस मिलने का मतलब यह नहीं कि आप गिरफ्तार हैं, और न ही इससे अपने-आप यह तय होता है कि आपकी गिरफ्तारी होगी। धारा 35(5) कहती है कि जो व्यक्ति नोटिस का पालन करता है और पालन करता रहता है, उसे नोटिस में बताए गए अपराध के लिए गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक अधिकारी यह कारण दर्ज न करे कि गिरफ्तारी क्यों ज़रूरी हो गई है।
इसका दूसरा पहलू भी अहम है। धारा 35(6) के तहत, अगर कोई व्यक्ति नोटिस का पालन नहीं करता, या अपनी पहचान बताने से इनकार करता है, तो अधिकारी उसे गिरफ्तार कर सकता है, बशर्ते सक्षम अदालत का कोई आदेश इसके आड़े न आए। इसलिए नोटिस को नज़रअंदाज़ करना गिरफ्तारी को न्योता देने का सबसे पक्का तरीका है।
बुज़ुर्गों और अशक्त लोगों के लिए विशेष सुरक्षा
धारा 35(7) एक और सुरक्षा देती है: जो व्यक्ति अशक्त (infirm) है या साठ साल से ज़्यादा उम्र का है, उसे तीन साल से कम कैद की सज़ा वाले अपराध में, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
नोटिस कैसे दिया जाना चाहिए
नोटिस लिखित में होना चाहिए और उसमें FIR या शिकायत, थाना, और पेश होने की तारीख़, समय और जगह लिखी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ये नोटिस कानून में बताए गए तरीके से दिए जाएँ, WhatsApp या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक मैसेज से नहीं। अगर आपको सिर्फ़ फ़ोन कॉल या मैसेज मिला है, तो विनम्रता से लिखित नोटिस माँगें।
नोटिस मिलने पर क्या करें
- नोटिस ध्यान से पढ़ें और मूल प्रति सँभालकर रखें। FIR नंबर, थाना, लगाई गई धाराएँ, और पेश होने की तारीख़ और समय नोट करें।
- FIR की कॉपी लें। हरियाणा में FIR आमतौर पर राज्य पुलिस के नागरिक सेवा पोर्टल पर ऑनलाइन मिल जाती है, संवेदनशील मामलों को छोड़कर। आपको ठीक-ठीक पता होना चाहिए कि आरोप क्या है।
- पेश होने से पहले कानूनी सलाह लें। वकील आरोपों, लगाए गए अपराधों की सज़ा, और गिरफ्तारी के असली ख़तरे का आकलन कर सकते हैं।
- सोचें कि क्या अग्रिम जमानत की ज़रूरत है। अगर धाराओं में सात साल से ज़्यादा सज़ा वाला कोई अपराध है, या ऐसे संकेत हैं कि नोटिस के बावजूद पुलिस गिरफ्तार कर सकती है, तो पेश होने से पहले धारा 482 BNSS के तहत अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की अर्ज़ी देना उचित हो सकता है।
- अपने दस्तावेज़ इकट्ठा करें। समझौते (agreements), रसीदें, बैंक स्टेटमेंट, मैसेज और ईमेल जो आपका पक्ष दिखाते हैं। उनकी कॉपी बनाएँ; ज़रूरी न हो तो मूल दस्तावेज़ न दें, और अगर कुछ लिया जाए तो ज़ब्ती मेमो (seizure memo) माँगें।
- दी गई तारीख़ पर पेश हों। अगर आप सच में नहीं जा सकते, तो जाँच अधिकारी को पहले से लिखित में कारण बताकर नई तारीख़ माँगें। उस अनुरोध का सबूत रखें।
थाने में
- नोटिस, पहचान पत्र और अपने दस्तावेज़ों की कॉपी साथ ले जाएँ।
- शिष्ट और सहयोगी रहें। सवालों के सच्चे जवाब दें, लेकिन आपको ऐसे बयान देने की ज़रूरत नहीं जो आपको ही दोषी ठहराएँ।
- कोरे काग़ज़ों या बिना पढ़े बयानों पर हस्ताक्षर न करें। जो भी आपके सामने रखा जाए उसे पढ़ें, और अगर उसमें आपकी कही बात सही दर्ज नहीं है तो सुधार माँगें।
- जिन अधिकारियों से मिलें उनके नाम, और पहुँचने व निकलने का समय नोट करें।
- आपको दोबारा बुलाया जा सकता है। लगातार सहयोग करना धारा 35(5) के तहत "नोटिस का पालन करने" का हिस्सा है।
अगर फिर भी गिरफ्तारी हो जाए तो?
अगर आपके पेश होने के बाद पुलिस तय करती है कि गिरफ्तारी ज़रूरी हो गई है, तो उसे इसके कारण दर्ज करने होंगे। तब आपको गिरफ्तार व्यक्ति के सभी अधिकार मिलते हैं, जिनमें गिरफ्तारी के आधार बताया जाना, परिवार के किसी सदस्य को सूचना दी जाना, और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना शामिल है, और उस चरण पर जमानत की अर्ज़ी दी जा सकती है। नोटिस की प्रक्रिया को अनदेखा करके की गई गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती भी दी जा सकती है। हमारा गुरुग्राम की अदालतों में आपराधिक मामले कैसे चलते हैं वाला पेज बताता है कि कौन-सी अर्ज़ी किस अदालत में सुनी जाती है।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-dhara-35-3-bnss-ka-pulis-notis-mila-hai-isaka-matalab-kya-hai-aur-kya-karen
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.