जमानत
गुरुग्राम में परिवार के किसी सदस्य की गिरफ्तारी हो गई? BNSS के तहत नियमित जमानत कैसे मिलती है
जब किसी अपने की गिरफ्तारी हो चुकी हो, तो अग्रिम जमानत का रास्ता बंद हो जाता है और रिहाई का रास्ता नियमित जमानत है। गिरफ्तारी के बाद क्या होता है, किस अदालत में जाएँ, अदालत क्या देखती है और डिफ़ॉल्ट जमानत क्या है।
यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें →फ़ोन आए कि परिवार के किसी सदस्य को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो पूरे घर के लिए यह बहुत तनाव का समय होता है। सवाल एक के बाद एक आते हैं: उन्हें कहाँ ले जाया गया है? अदालत में कब पेश किया जाएगा? उन्हें बाहर कैसे निकालें? यह लेख सरल भाषा में बताता है कि नए आपराधिक प्रक्रिया कानून, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत गुरुग्राम में नियमित जमानत (regular bail) कैसे काम करती है।
नियमित जमानत अग्रिम जमानत से अलग है। अग्रिम जमानत (anticipatory bail) गिरफ्तारी से पहले माँगी जाती है। जब व्यक्ति सच में हिरासत में आ चुका हो, तब उपाय नियमित जमानत है, यानी अदालत से यह माँगना कि जाँच या मुकदमा चलते रहने के दौरान व्यक्ति को रिहा किया जाए।
सबसे पहले, गिरफ्तारी के ठीक बाद क्या होता है
BNSS गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ बुनियादी सुरक्षाएँ देती है। इन्हें जानने से परिवार जल्दी और शांति से कदम उठा पाता है।
- गिरफ्तारी के आधार। धारा 47 BNSS (पहले धारा 50 CrPC) के तहत पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताने होते हैं, और जमानती अपराध में यह भी बताना होता है कि उसे जमानत पर रिहा होने का हक़ है।
- रिश्तेदार या मित्र को सूचना। धारा 48 BNSS (पहले धारा 50A CrPC) के तहत पुलिस को किसी रिश्तेदार, मित्र या नामित व्यक्ति को गिरफ्तारी और उस जगह की जानकारी देनी होती है जहाँ व्यक्ति को रखा गया है।
- 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी। धारा 58 BNSS (पहले धारा 57 CrPC) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना 24 घंटे से ज़्यादा पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता; इसमें यात्रा का समय शामिल नहीं होता।
- वकील से मिलने का अधिकार। गिरफ्तार व्यक्ति पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिल सकता है, हालाँकि ज़रूरी नहीं कि पूरी पूछताछ के दौरान।
पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट तय करते हैं कि व्यक्ति को पुलिस हिरासत (रिमांड) में भेजा जाए, न्यायिक हिरासत में भेजा जाए, या रिहा किया जाए। अक्सर यही रिमांड का विरोध करने और जमानत माँगने का पहला मौका होता है।
जमानती या गैर-जमानती: पहला सवाल
सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि अपराध जमानती (bailable) है या गैर-जमानती (non-bailable)। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के अपराधों के लिए यह BNSS की पहली अनुसूची (First Schedule) में लिखा होता है।
जमानती अपराध
जमानती अपराध में जमानत एक अधिकार है। धारा 478 BNSS (पहले धारा 436 CrPC) के तहत, जैसे ही व्यक्ति ज़मानती या बिना ज़मानती के बॉन्ड भरने को तैयार हो, उसे जमानत पर छोड़ना होता है। थाना प्रभारी या अदालत के पास मना करने का विवेक नहीं होता, हालाँकि बॉन्ड की राशि और शर्तें तय की जा सकती हैं।
गैर-जमानती अपराध
गैर-जमानती अपराध में जमानत अदालत के विवेक पर होती है। "गैर-जमानती" का मतलब यह नहीं कि जमानत मिल ही नहीं सकती। इसका मतलब है कि तथ्यों को देखने के बाद अदालत को संतुष्ट करना होता है कि रिहाई उचित है।
किस अदालत में जाएँ
- मजिस्ट्रेट की अदालत। मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय गैर-जमानती अपराधों में जमानत अर्जी आमतौर पर पहले गुरुग्राम ज़िला अदालत में संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 480 BNSS (पहले धारा 437 CrPC) के तहत लगाई जाती है। जहाँ अपराध की सज़ा मृत्युदंड या आजीवन कारावास हो, वहाँ कुछ सीमित अपवादों को छोड़कर मजिस्ट्रेट आमतौर पर जमानत नहीं दे सकते।
- सेशन कोर्ट। अगर मजिस्ट्रेट जमानत से मना कर दें, या अपराध गंभीर हो और सेशन कोर्ट द्वारा विचारणीय हो, तो अर्जी सेशन कोर्ट में धारा 483 BNSS (पहले धारा 439 CrPC) के तहत लगाई जाती है।
- हाईकोर्ट। अगर सेशन कोर्ट अर्जी खारिज कर दे, तो चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में नई अर्जी लगाई जा सकती है, जिसके पास धारा 483 BNSS के तहत यही शक्ति है।
अदालत क्या देखती है
अदालत कई बातों को तौलती है। मुख्य बातें ये हैं:
- आरोप की प्रकृति और गंभीरता, और उसकी सज़ा
- अब तक जुटाई गई सामग्री और आरोपी की बताई गई भूमिका
- आरोपी के भाग जाने या मुकदमे में पेश न होने की संभावना
- सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने का खतरा
- आरोपी का पिछला रिकॉर्ड, अगर कोई हो
- व्यक्ति कितने समय से हिरासत में है, और जाँच पूरी हुई है या नहीं (जैसे चार्जशीट दाखिल हुई है या नहीं)
- उम्र, स्वास्थ्य और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ जैसी निजी परिस्थितियाँ
अदालतों द्वारा बार-बार दोहराया गया एक स्थापित सिद्धांत है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, खासकर उस व्यक्ति के लिए जिसे दोषी नहीं ठहराया गया है। साथ ही, गंभीर अपराधों में अदालत रिहाई से पहले सबूतों को ध्यान से देखती है।
डिफ़ॉल्ट जमानत: जब पुलिस समय पर चार्जशीट दाखिल न करे
एक अहम सुरक्षा है डिफ़ॉल्ट जमानत (default bail), जिसे वैधानिक जमानत (statutory bail) भी कहते हैं, जो धारा 187 BNSS (पहले धारा 167(2) CrPC) के तहत मिलती है। अगर पुलिस तय समय के भीतर जाँच पूरी करके चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आरोपी जमानत पर रिहा होने का हकदार हो जाता है, बशर्ते वह इसके लिए अर्जी दे और जमानत भरने को तैयार हो।
- मृत्युदंड, आजीवन कारावास या कम से कम दस साल की कैद वाले अपराधों में 90 दिन
- अन्य अपराधों में 60 दिन
समय बहुत मायने रखता है। अगर आरोपी के अर्जी देने से पहले चार्जशीट दाखिल हो जाए, तो आमतौर पर यह अधिकार खत्म हो जाता है, इसलिए परिवार को गिरफ्तारी की तारीख और पहले रिमांड की तारीख का ध्यान रखना चाहिए। NDPS Act जैसे विशेष कानूनों में अपनी लंबी समय-सीमाएँ और जमानत की कड़ी शर्तें होती हैं।
विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत
धारा 479 BNSS (पहले धारा 436A CrPC) उन विचाराधीन कैदियों (undertrial prisoners) से जुड़ी है जो लंबे समय से हिरासत में हैं। मोटे तौर पर, जो व्यक्ति अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय हिरासत में बिता चुका है, वह रिहाई माँग सकता है, और BNSS पहली बार अपराध करने वालों के लिए ज़्यादा नरम नियम देती है। यह मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराधों पर लागू नहीं होती।
परिवार के लिए व्यावहारिक कदम
- थाने और FIR नंबर का पता करें। FIR की कॉपी आमतौर पर हरियाणा पुलिस की वेबसाइट से डाउनलोड की जा सकती है।
- गिरफ्तारी की तारीख और समय नोट करें। यह 24 घंटे के नियम और डिफ़ॉल्ट जमानत, दोनों के लिए ज़रूरी है।
- दस्तावेज़ जुटाएँ। आरोपी का पहचान और पते का प्रमाण, नौकरी या कारोबार का प्रमाण, ज़रूरत हो तो मेडिकल रिकॉर्ड, और आरोपी के पक्ष का समर्थन करने वाले दस्तावेज़।
- ज़मानती (surety) का इंतज़ाम करें। अदालतें आमतौर पर एक या अधिक ज़मानती माँगती हैं, यानी स्थायी पते और कुछ साधन वाला व्यक्ति, उसके पहचान पत्र और संपत्ति या आय के दस्तावेज़ों के साथ।
- शिकायतकर्ता या गवाहों से संपर्क न करें। उन पर दबाव डालने की कोई भी कोशिश जमानत अर्जी को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है।
- जमानत आदेश मिलने पर उसे संभालकर रखें। शर्तें ध्यान से पढ़ें। उन्हें तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है।
जमानत की आम शर्तें
- तय राशि का निजी बॉन्ड और ज़मानती देना
- सुनवाई की हर तारीख पर अदालत में पेश होना
- अदालत की अनुमति के बिना देश से बाहर न जाना, और कभी-कभी पासपोर्ट जमा करना
- गवाहों को धमकाना या प्रभावित न करना, और वैसा ही अपराध दोबारा न करना
- बुलाए जाने पर जाँच में शामिल होना
अगर आगे और कार्यवाही होती है या व्यक्ति खुद FIR को चुनौती देना चाहता है, तो हाईकोर्ट में FIR रद्द (quash) करवाने जैसा अलग उपाय प्रासंगिक हो सकता है। जमानत से सिर्फ़ रिहाई मिलती है; मुकदमा खत्म नहीं होता।
अधिवक्ता आशुतोष हंस · https://ashutoshhans.in/blog/gurugram-men-parivar-ke-kisi-sadasy-ki-giraphtari-ho-gaee-bnss-ke-tahat-niyamit-jamanat-ka
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.