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आपराधिक प्रक्रिया

गुरुग्राम में पुलिस ने आपकी गाड़ी, फ़ोन या कैश ज़ब्त कर लिया? BNSS के तहत उसे वापस कैसे पाएँ

पुलिस द्वारा आपकी गाड़ी, फ़ोन, कैश या दस्तावेज़ ज़ब्त करना ज़ब्ती (confiscation) नहीं है। गुरुग्राम में धारा 497 और 503 BNSS के तहत मजिस्ट्रेट से सुपुर्दगी (superdari) पर रिहाई कैसे माँगी जाती है।

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ऐसा जितना लोग सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा होता है। एक्सीडेंट के बाद गाड़ी थाने ले जाई जाती है। साइबर शिकायत में मोबाइल फ़ोन "जाँच के लिए" ले लिया जाता है। तलाशी के दौरान कैश, गहने या कागज़ात उठा लिए जाते हैं। हफ़्ते बीत जाते हैं, गाड़ी थाने में खुले में खड़ी रहती है, और मालिक को कोई नहीं बताता कि वह कब लौटेगी, या लौटेगी भी या नहीं।

पुलिस का किसी चीज़ को कब्ज़े में लेना (seizure) उसे हमेशा के लिए ज़ब्त कर लेना (confiscation) नहीं है। ज़्यादातर मामलों में सामान सिर्फ़ इसलिए रखा जाता है कि वह सबूत के तौर पर काम आ सकता है, और कानून मालिक को केस चलते हुए भी उसे वापस माँगने का साफ़ रास्ता देता है। यह लेख बताता है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत यह कैसे होता है, जिसने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली है।

पुलिस आपका सामान क्यों ज़ब्त कर सकती है

पुलिस को सामान ज़ब्त करने की शक्ति BNSS की धारा 106 (पहले धारा 102 CrPC) से मिलती है। अधिकारी ऐसा सामान ज़ब्त कर सकता है जिसके चोरी होने का आरोप या शक हो, या जो ऐसी परिस्थितियों में मिले जिनसे किसी अपराध का शक पैदा हो। व्यवहार में इसमें ऐसी चीज़ें आती हैं:

  • सड़क दुर्घटना में शामिल या किसी अपराध में कथित रूप से इस्तेमाल हुई गाड़ी;
  • साइबर क्राइम या धोखाधड़ी की शिकायत में मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप या SIM कार्ड;
  • तलाशी के दौरान बरामद कैश, सोना या दूसरा कीमती सामान;
  • धोखाधड़ी के मामले में मूल दस्तावेज़, चेक या खाते के रिकॉर्ड।

ज़ब्ती की रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को देनी होती है। आम तौर पर मौके पर ही ज़ब्ती का मेमो (जिसे अक्सर फ़र्द या रिकवरी मेमो कहते हैं) बनाया जाता है और गवाह उस पर दस्तख़त करते हैं। अगर आपका सामान ले लिया गया है, तो इस मेमो की कॉपी माँगें, या कम से कम उसकी तारीख़ और FIR नंबर नोट कर लें।

ज़ब्ती से आपका मालिकाना हक़ ख़त्म नहीं होता

बहुत-से लोग मानते हैं कि एक बार सामान थाने (मालख़ाना) में चला गया, तो वह ट्रायल ख़त्म होने तक वहीं रहेगा, जिसमें सालों लग सकते हैं। कानून का इरादा ऐसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने Sunderbhai Ambalal Desai v. State of Gujarat (2002) में कहा कि गाड़ियों जैसे ज़ब्त सामान को लंबे समय तक थानों में पड़ा रखने से कोई फ़ायदा नहीं होता: वे ख़राब होते हैं, उनकी कीमत घटती है और रखने की समस्या खड़ी होती है। अदालत ने मजिस्ट्रेटों से कहा कि ठीक रिकॉर्ड और फ़ोटो बनाने के बाद ऐसा सामान उचित शर्तों पर, उसके हक़दार व्यक्ति को जल्दी लौटाया जाए।

BNSS ने यही सोच अब सीधे कानून में शामिल कर दी है।

दो ज़रूरी प्रावधान

धारा 497 BNSS: अदालत में पेश किया गया सामान

BNSS की धारा 497 (पहले धारा 451 CrPC) तब लागू होती है जब ज़ब्त सामान जाँच, पूछताछ (inquiry) या ट्रायल के दौरान आपराधिक अदालत में पेश किया गया हो। अदालत केस ख़त्म होने तक उसकी उचित हिफ़ाज़त का आदेश दे सकती है, और जो सामान जल्दी और स्वाभाविक रूप से ख़राब होने वाला हो, या जहाँ ऐसा करना उचित हो, उसकी बिक्री या दूसरे निपटारे का आदेश दे सकती है।

BNSS ने कुछ खास कदम जोड़े हैं जो पुराने कानून में नहीं थे:

  • सामान पेश होने के चौदह दिन के भीतर अदालत या मजिस्ट्रेट उसका विवरण देने वाला एक बयान (statement) तैयार करेंगे;
  • सामान की फ़ोटो ली जाएगी और ज़रूरत हो तो वीडियो भी बनाया जाएगा, जो मोबाइल फ़ोन या किसी दूसरे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी हो सकता है;
  • यह बयान और फ़ोटो या वीडियो पूछताछ, ट्रायल या दूसरी कार्यवाही में सबूत के तौर पर इस्तेमाल हो सकते हैं; और
  • बयान तैयार होने और फ़ोटो या वीडियो लिए जाने के तीस दिन के भीतर अदालत सामान के निपटारे, नष्ट करने, ज़ब्ती (confiscation) या सौंपने (delivery) का आदेश देगी।

मकसद सीधा है: एक बार सामान का ठीक से रिकॉर्ड बन गया, तो वही रिकॉर्ड सबूत का काम कर सकता है, और असली चीज़ को पूरे ट्रायल तक बंद रखने की ज़रूरत नहीं रहती।

धारा 503 BNSS: जो सामान अदालत में पेश नहीं हुआ

BNSS की धारा 503 (पहले धारा 457 CrPC) उस सामान पर लागू होती है जिसे पुलिस ने ज़ब्त तो किया है लेकिन अदालत में पेश नहीं किया, जो थाने में खड़ी गाड़ियों के मामले में आम है। मजिस्ट्रेट उसके निपटारे या कब्ज़े के हक़दार व्यक्ति को सौंपने, या उसकी हिफ़ाज़त और पेशी का आदेश दे सकते हैं।

चरण दर चरण: गुरुग्राम में अपना सामान वापस कैसे पाएँ

  1. बुनियादी जानकारी इकट्ठा करें। FIR नंबर, थाना, ज़ब्ती की तारीख़ और जाँच अधिकारी (investigating officer) का नाम नोट करें। हो सके तो ज़ब्ती मेमो की कॉपी लें।
  2. मालिकाना हक़ का सबूत जुटाएँ। गाड़ी के लिए: रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट (RC), बीमा, और ख़रीद का बिल या फ़ाइनेंस हो तो लोन के कागज़। फ़ोन या लैपटॉप के लिए: ख़रीद का बिल, IMEI या सीरियल नंबर वाला डिब्बा, या ख़रीद का बैंक रिकॉर्ड। कैश या गहनों के लिए: उनका स्रोत दिखाने वाली कोई भी चीज़, जैसे बैंक से निकासी की पर्ची या ख़रीद के बिल।
  3. जाँच अधिकारी से पूछें। कई बार पुलिस का अपना काम (जैसे एक्सीडेंट वाली गाड़ी का मैकेनिकल निरीक्षण, या फ़ोन के डेटा की फ़ॉरेंसिक कॉपी) पूरा होने के बाद उसे सामान लौटाने में कोई आपत्ति नहीं होती। मालिकाना कागज़ों की कॉपी के साथ एक छोटा लिखित अनुरोध पहला समझदारी भरा कदम है।
  4. मजिस्ट्रेट के सामने रिहाई की अर्ज़ी दें। अगर पुलिस सामान नहीं लौटाती, तो मामले के अनुसार धारा 497 या धारा 503 BNSS के तहत अर्ज़ी गुरुग्राम ज़िला अदालत के उस न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दी जाती है जिसके क्षेत्राधिकार में केस है। अदालत आम तौर पर पुलिस से रिपोर्ट मँगाती है।
  5. शर्तों का पालन करें। रिहाई अक्सर सुपुर्दगी (superdari) पर होती है, यानी मालिक अदालत के ट्रस्टी के तौर पर सामान अपने पास रखता है। आम शर्तों में बॉन्ड भरना (कभी-कभी ज़मानती के साथ), अदालत की अनुमति के बिना सामान को न बेचने, न ट्रांसफ़र करने या उसका रूप न बदलने का वचन, और अदालत के माँगने पर उसे पेश करना शामिल है।

अदालत क्या देखती है

  • सामान का हक़दार कौन है। अगर कोई दूसरा दावेदार है, जैसे ख़रीदार और फ़ाइनेंसर के बीच, या परिवार के दो सदस्यों के बीच, तो अदालत तय करती है कि अंतरिम कब्ज़ा किसे मिले।
  • क्या जाँच को अभी भी उसकी ज़रूरत है। फ़ॉरेंसिक जाँच के इंतज़ार में पड़ा फ़ोन, या तकनीकी रिपोर्ट के इंतज़ार में खड़ी गाड़ी, शायद वह कदम पूरा होने के बाद ही छोड़ी जाए।
  • क्या सामान का पर्याप्त रिकॉर्ड बन सकता है। फ़ोटो, वीडियो, पंचनामा और रिपोर्ट से अक्सर पुलिस के पास सामान रखने की ज़रूरत नहीं रहती।
  • क्या कोई विशेष कानून रिहाई पर रोक लगाता है। कुछ विशेष कानूनों, जैसे नशीले पदार्थों, आबकारी (excise) या वन अपराधों से जुड़े कानूनों में ज़ब्ती, रिहाई और ज़ब्ती (confiscation) के अपने नियम हैं। ऐसे मामलों में BNSS के सामान्य प्रावधान उसी तरह लागू नहीं भी हो सकते, और उस विशेष कानून को देखना पड़ता है।

कुछ खास स्थितियाँ

मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप

साइबर क्राइम और धोखाधड़ी के मामलों में डिवाइस अक्सर इसलिए ज़ब्त होते हैं क्योंकि उनमें सबूत होता है। आम तौर पर ज़रूरी डेटा निकाल लिए जाने या डिवाइस की जाँच हो जाने के बाद रिहाई पर विचार होता है। अगर फ़ोन किसी ऐसे व्यक्ति का है जो आरोपी नहीं है, जैसे कोई गवाह या परिवार का सदस्य, तो यह बात अदालत के सामने रखना अहम है।

कैश और बैंक खाते

तलाशी में ज़ब्त कैश को भी इसी तरह सामान माना जाता है। फ्रीज़ किया गया बैंक खाता इससे जुड़ी लेकिन अलग समस्या है; इस पर हमारे लेख साइबर पुलिस द्वारा फ्रीज़ किए गए बैंक खाते में अलग से चर्चा की गई है।

दुर्घटना के मामलों में गाड़ियाँ

सड़क दुर्घटना के बाद आम तौर पर गाड़ी की हालत दर्ज करने के लिए उसका निरीक्षण होता है। एक बार निरीक्षण रिपोर्ट रिकॉर्ड पर आ जाए और गाड़ी की फ़ोटो ले ली जाए, तो अक्सर उसके थाने में पड़े रहने का कोई ख़ास कारण नहीं बचता।

आम गलतियाँ जिनसे बचें

  • बहुत देर तक इंतज़ार करना। खुले में खड़ी गाड़ियाँ जल्दी ख़राब होती हैं, बैटरी, टायर और इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर पड़ता है। जल्दी अर्ज़ी देने से सामान की कीमत बची रहती है।
  • "रिहाई करवाने" के लिए किसी को पैसे देना। रिहाई अदालत के आदेश से, या पुलिस द्वारा दर्ज प्रक्रिया से होती है। कभी भी अनौपचारिक पैसे न दें।
  • सुपुर्दगी पर मिला सामान बेचना या उसमें बदलाव करना। अदालत की अनुमति के बिना ऐसा करना बॉन्ड का उल्लंघन हो सकता है और केस में गंभीर दिक्कतें खड़ी कर सकता है।
  • दूसरे दावों को नज़रअंदाज़ करना। अगर कोई फ़ाइनेंसर या दूसरा व्यक्ति भी सामान पर दावा करता है, तो बेहतर है कि यह बात खुलकर अदालत के सामने रखी जाए, बजाय इसके कि बाद में आदेश को चुनौती दी जाए।
अधिवक्ता आशुतोष हंस अपनी स्थिति के बारे में कोई प्रश्न है? मामले की संक्षिप्त जानकारी और बात करने का सुविधाजनक समय बताएँ।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.