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साइबर क्राइम

WhatsApp और Instagram की 5 बातें जिन पर आपके खिलाफ़ FIR हो सकती है

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि एक फ़ॉरवर्ड, गुस्से में भेजा मैसेज या "मज़ाक" वाली फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल बस ऑनलाइन व्यवहार है। कानून इनमें से कई को अपराध मानता है। WhatsApp और Instagram की पाँच आम बातें जिन पर BNS और IT Act के तहत FIR हो सकती है, और कानून के सही पक्ष में कैसे रहें।

"बस फ़ॉरवर्ड ही तो किया था।" "गुस्से में बोल दिया था।" "मज़ाक वाली प्रोफ़ाइल थी।" फ़ोन पर की गई किसी बात पर पुलिस शिकायत पहुँचने के बाद लोग अक्सर यही कहते हैं। ज़्यादातर ने सोचा भी नहीं था कि एक मैसेज या पोस्ट आपराधिक मामला बन सकता है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) के तहत कई रोज़मर्रा की ऑनलाइन हरकतें ऐसा बन सकती हैं।

1. डर या नफ़रत फैलाने वाली फ़र्ज़ी ख़बर या अफ़वाह फ़ॉरवर्ड करना

जनता में डर या घबराहट फैलाने, या एक समूह को दूसरे के खिलाफ़ भड़काने के इरादे से कोई बयान या अफ़वाह बनाना, प्रकाशित करना या फैलाना, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी, धारा 353 BNS (पहले धारा 505 IPC) के तहत अपराध है। धर्म, जाति, जन्मस्थान, भाषा या समुदाय के आधार पर समूहों के बीच दुश्मनी फैलाना अलग से धारा 196 BNS (पहले धारा 153A IPC) के तहत दंडनीय है। "मैंने तो बस फ़ॉरवर्ड किया" अपने आप बचाव नहीं है, क्योंकि फैलाना भी इसमें शामिल है।

2. धमकी भरे मैसेज

किसी व्यक्ति, उसकी प्रतिष्ठा या संपत्ति, या उसके किसी प्रियजन को नुकसान पहुँचाने की धमकी वाला मैसेज, डराने के इरादे से भेजा गया हो, तो यह धारा 351 BNS (पहले धारा 503 और 506 IPC) के तहत आपराधिक धमकी हो सकता है। गुमनाम या छिपे अकाउंट से भेजी गई धमकी पर ज़्यादा सज़ा है। वॉयस नोट या चैट में गुस्से में लिखे शब्द भी शब्द ही हैं, और स्क्रीनशॉट आसान सबूत हैं।

3. किसी की निजी फ़ोटो या वीडियो, या मॉर्फ़ की गई तस्वीरें शेयर करना

किसी व्यक्ति के निजी अंगों की तस्वीर बिना सहमति के लेना, प्रकाशित करना या भेजना IT Act की धारा 66E के तहत अपराध है। इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील या यौन रूप से स्पष्ट सामग्री प्रकाशित करना या भेजना धारा 67 और 67A के तहत दंडनीय है। अगर तस्वीरें किसी महिला की निजी गतिविधि की हैं, तो उन्हें फैलाना धारा 77 BNS के तहत दृश्यरतिकता (voyeurism) है। मॉर्फ़ की गई या "डीपफ़ेक" तस्वीरों पर ये प्रावधान और मानहानि भी लग सकते हैं। फ़ोटो लेने की सहमति, उसे शेयर करने की सहमति नहीं है।

4. किसी और के नाम से फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल

किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान, फ़ोटो या जानकारी का इस्तेमाल करके अकाउंट बनाना या दूसरों को धोखा देना IT Act की धारा 66C के तहत पहचान की चोरी और धारा 66D के तहत कंप्यूटर संसाधन से प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी हो सकता है, और जहाँ किसी को धोखा दिया गया हो वहाँ BNS के तहत प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी भी। किसी सहपाठी या सहकर्मी की "मज़ाक" वाली प्रोफ़ाइल बहुत जल्दी आपराधिक शिकायत बन सकती है।

5. "ना" कहने के बाद भी किसी महिला को बार-बार मैसेज करना

किसी महिला के स्पष्ट इनकार के बावजूद उसका पीछा करना या बार-बार संपर्क करना, जिसमें उसके इंटरनेट, ईमेल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार पर नज़र रखना भी शामिल है, धारा 78 BNS (पहले धारा 354D IPC) के तहत पीछा करना (stalking) है। लगातार DM, ब्लॉक होने के बाद नए नंबरों से कॉल, और उस तक पहुँचने के लिए नए अकाउंट बनाना, सब इसी में आता है।

दो और बातें जिन्हें लोग अक्सर गलत समझते हैं

  • मानहानिकारक पोस्ट और स्टोरी। किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाले झूठे तथ्य प्रकाशित करना धारा 356 BNS (पहले धारा 499 और 500 IPC) के तहत आपराधिक मानहानि हो सकती है। ईमानदार राय और जनहित में सच मान्य अपवाद हैं, लेकिन बिना तथ्यों के किसी को ऑनलाइन बदनाम करना जोखिम भरा है।
  • बाल यौन शोषण सामग्री कभी फ़ॉरवर्ड न करें, "रिपोर्ट" करने के लिए भी नहीं। ऐसी सामग्री प्रकाशित करना या भेजना IT Act की धारा 67B और POCSO अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है, और सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि शेयर करने के इरादे से उसे रखना भी अपराध हो सकता है। इसके बजाय, बिना फ़ॉरवर्ड किए, cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें।

क्या अपराध नहीं है

कानून अभिव्यक्ति की आज़ादी की भी रक्षा करता है। श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में सुप्रीम कोर्ट ने IT Act की धारा 66A रद्द कर दी थी, जो "बेहद आपत्तिजनक" या "परेशान करने वाले" ऑनलाइन मैसेज को अपराध बनाती थी। आलोचना, असहमति और राय, तीखी भी हो, अपने आप में अपराध नहीं है। अदालतों ने यह भी माना है कि WhatsApp ग्रुप एडमिन केवल एडमिन होने के कारण किसी दूसरे सदस्य की पोस्ट के लिए आम तौर पर आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं है। सीमा धमकी, दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले जानबूझकर झूठ, निजता के उल्लंघन, प्रतिरूपण और उत्पीड़न से पार होती है, राय रखने से नहीं।

पोस्ट या फ़ॉरवर्ड करने से पहले एक आसान जाँच

  • क्या मुझे पता है कि यह सच है?
  • क्या मैं यह बात उस व्यक्ति के सामने, पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में कहूँगा?
  • क्या मेरे पास यह फ़ोटो या वीडियो शेयर करने की सहमति है?
  • क्या इससे कोई डर सकता है, या एक समूह दूसरे के खिलाफ़ हो सकता है?

अगर किसी ऑनलाइन पोस्ट पर आपके पास FIR या पुलिस नोटिस पहुँचे, तो घबराकर चैट या अकाउंट डिलीट न करें, शिकायतकर्ता पर दबाव डालने के लिए संपर्क न करें, और जल्दी कानूनी सलाह लें। देखें: धारा 35(3) BNSS का पुलिस नोटिस मिला है? और पुलिस ने गिरफ्तार किया? हर व्यक्ति के 5 अधिकार। अगर आप इनमें से किसी के शिकार हैं, तो cybercrime.gov.in पर या 1930 पर कॉल करके शिकायत करें।

अधिवक्ता आशुतोष हंस अपनी स्थिति के बारे में कोई प्रश्न है? मामले की संक्षिप्त जानकारी और बात करने का सुविधाजनक समय बताएँ।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.