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आपराधिक प्रक्रिया

गुरुग्राम में पुलिस FIR दर्ज नहीं कर रही? BNSS के तहत आपके अधिकार और उपाय

अगर गुरुग्राम का कोई थाना आपकी शिकायत दर्ज करने से मना कर दे, तो कानून आपको साफ़ रास्ते देता है। धारा 173 BNSS के तहत आपके अधिकार, ज़ीरो FIR, प्रारंभिक जाँच का नियम, और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी व मजिस्ट्रेट के पास कैसे जाएँ।

आप किसी अपराध की रिपोर्ट करने गुरुग्राम के थाने जाते हैं, और ड्यूटी पर बैठे अधिकारी कहते हैं "बाद में आना", या "आपस में निपट लो", या कुछ भी लिखने से साफ़ मना कर देते हैं। ऐसा जितना होना चाहिए उससे कहीं ज़्यादा होता है, और लोगों को लगता है कि अब कहीं जाने का रास्ता नहीं बचा। लेकिन कानून साफ़ है कि गंभीर (संज्ञेय) अपराधों में पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होगी, और अगर पुलिस ऐसा न करे तो कानून आपको कई व्यावहारिक रास्ते देता है।

यह लेख भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS), जिसने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली है, के तहत आपके अधिकार समझाता है, और बताता है कि अगर पुलिस आपकी FIR दर्ज नहीं कर रही तो आप किस क्रम में क्या कदम उठा सकते हैं।

पहले यह देखें: क्या आपकी शिकायत संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की है?

FIR दर्ज करने की बाध्यता संज्ञेय अपराधों पर लागू होती है: यानी ऐसे अपराध जिनमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है और अदालत की अनुमति के बिना जाँच शुरू कर सकती है। चोरी, लूट, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, गंभीर मारपीट, यौन अपराध, दहेज से जुड़ी क्रूरता और ज़्यादातर ऑनलाइन धोखाधड़ी इसी श्रेणी में आते हैं।

असंज्ञेय अपराधों (non-cognizable offences) में (जैसे कई छोटे-मोटे झगड़े या साधारण अपमान), पुलिस जानकारी को एक रजिस्टर में दर्ज करती है और आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है; मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस उनकी जाँच नहीं कर सकती। इसलिए अगर पुलिस कहे कि आपका मामला "असंज्ञेय" है, तो यह अपने-आप गलत नहीं है। यह जाँचना ज़रूरी है कि आपके तथ्यों से असल में कौन-सा अपराध बनता है।

पुलिस को जानकारी देते समय आपके बुनियादी अधिकार

धारा 173 BNSS (पहले धारा 154 CrPC) के तहत:

  • पुलिस को संज्ञेय अपराध की जानकारी दर्ज करनी ही होगी। जानकारी मौखिक रूप से दी जा सकती है (अधिकारी उसे लिखेगा और आपको पढ़कर सुनाएगा) या लिखित रूप में।
  • क्षेत्राधिकार (jurisdiction) बहाना नहीं है। कानून अब साफ़ तौर पर कहता है कि जानकारी किसी भी थाने में दी जा सकती है, चाहे अपराध किसी भी इलाके में हुआ हो। इसे आम तौर पर "ज़ीरो FIR" कहते हैं; थाना इसे दर्ज करके उस थाने को भेज देता है जिसका क्षेत्राधिकार है।
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई जानकारी मान्य है। जानकारी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दी जा सकती है, लेकिन वह रिकॉर्ड पर तब ली जाती है जब देने वाला व्यक्ति तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर कर दे।
  • दर्ज की गई जानकारी की मुफ़्त कॉपी पाने का आपको अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी एक संविधान पीठ के फ़ैसले (Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh) में कहा है कि जब जानकारी से संज्ञेय अपराध बनता हो तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है, और केवल कुछ सीमित श्रेणियों में ही पहले प्रारंभिक जाँच हो सकती है।

"प्रारंभिक जाँच" (preliminary enquiry) वाला अपवाद

BNSS एक नई व्यवस्था जोड़ता है। ऐसे संज्ञेय अपराध जिनमें तीन साल या उससे ज़्यादा लेकिन सात साल से कम की सज़ा है, उनमें थाना प्रभारी, कम से कम उप पुलिस अधीक्षक (DSP) रैंक के अधिकारी की अनुमति से, 14 दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच कर सकता है, यह देखने के लिए कि पहली नज़र में मामला बनता है या नहीं। यह अनिश्चित काल तक टालने की छूट नहीं है। अगर आपको बताया जाए कि जाँच चल रही है, तो तारीख नोट करें और जाँच करने वाले अधिकारी का नाम और रैंक पूछें।

अगर पुलिस मना कर दे तो क्या करें: चरण दर चरण

चरण 1: थाने में लिखित रिकॉर्ड रखें

  • लिखित शिकायत दें और उसकी रसीद या मोहर लगी कॉपी ("डायरी नंबर") माँगें।
  • तारीख, समय, जिस अधिकारी से मिले उसका नाम और पद, और आपको क्या कहा गया, यह सब नोट करें।
  • सभी सहायक सामग्री की कॉपी रखें: स्क्रीनशॉट, बैंक स्टेटमेंट, मेडिकल कागज़, फ़ोटो, गवाहों के नाम।

यह रिकॉर्ड बहुत ज़रूरी है, क्योंकि आगे के हर उपाय में यह दिखाना पड़ता है कि आप पुलिस के पास गए थे और उन्होंने कार्रवाई नहीं की।

चरण 2: शिकायत पुलिस अधीक्षक / पुलिस आयुक्त को भेजें

धारा 173(4) BNSS (पहले धारा 154(3) CrPC) के तहत, अगर थाना प्रभारी जानकारी दर्ज करने से मना कर दे, तो आप उसका सार लिखित रूप में और डाक से पुलिस अधीक्षक (SP) को भेज सकते हैं। गुरुग्राम में पुलिस कमिश्नरेट है, इसलिए यहाँ इसका मतलब पुलिस आयुक्त या उस इलाके के पुलिस उपायुक्त (DCP) से है। अगर वरिष्ठ अधिकारी संतुष्ट हो कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो वह खुद जाँच कर सकता है या किसी अधीनस्थ अधिकारी को जाँच का निर्देश दे सकता है।

शिकायत रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट से भेजें और उसकी रसीद व ट्रैकिंग रिकॉर्ड संभालकर रखें। कई लोग यही शिकायत राज्य पुलिस के नागरिक सेवा पोर्टल पर ऑनलाइन भी जमा करते हैं और उसकी पावती रख लेते हैं।

चरण 3: धारा 175(3) BNSS के तहत मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करें

अगर पुलिस फिर भी कार्रवाई न करे, तो आप धारा 175(3) BNSS (पहले धारा 156(3) CrPC) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दे सकते हैं, जिसमें अदालत से माँग की जाती है कि वह पुलिस को FIR दर्ज करके जाँच करने का निर्देश दे। BNSS ने इसमें कुछ ज़रूरी शर्तें जोड़ी हैं:

  • आवेदन धारा 173(4) के तहत पुलिस अधीक्षक के पास जाने के बाद ही किया जाना चाहिए, इसलिए चरण 2 वाली डाक से भेजी गई शिकायत महत्वपूर्ण है।
  • आवेदन के साथ शपथपत्र (affidavit) होना चाहिए।
  • मजिस्ट्रेट ज़रूरी समझे तो जाँच कर सकता है, और आदेश देने से पहले पुलिस अधिकारी की बात पर विचार करना ज़रूरी है।

इसके अलावा, तथ्यों के अनुसार, कोई व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत (private complaint) भी दायर कर सकता है; मजिस्ट्रेट बयान दर्ज करके तय करता है कि आरोपी को समन किया जाए या नहीं। कौन-सा रास्ता बेहतर है, यह इस पर निर्भर करता है कि क्या पुलिस जाँच (जैसे बैंक रिकॉर्ड या CCTV फ़ुटेज जुटाना) वाकई ज़रूरी है।

चरण 4: सीमित मामलों में हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में रिट याचिका या अन्य कार्यवाही के ज़रिए जाया जा सकता है, लेकिन अदालतें आम तौर पर उम्मीद करती हैं कि लोग पहले ऊपर बताए गए उपाय अपनाएँ। हाईकोर्ट आम तौर पर केवल असाधारण स्थितियों में सही मंच होता है, जैसे जब बाकी रास्ते साफ़ तौर पर नाकाम हो चुके हों या खुद पुलिस के खिलाफ गंभीर आरोप हों।

कुछ खास स्थितियाँ

  • ऑनलाइन धोखाधड़ी: तुरंत राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें, और पुलिस को भी बताएँ। ऐसे मामलों में सबसे ज़्यादा मायने रफ़्तार रखती है; हमारा लेख देखें: ऑनलाइन धोखाधड़ी के बाद पहले 24 घंटों में क्या करें।
  • महिलाओं के विरुद्ध अपराध: BNSS के अनुसार कुछ जानकारी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज की जानी चाहिए, और शिकायतकर्ता के लिए अतिरिक्त सुरक्षा का प्रावधान है।
  • अधिकारी की जवाबदेही: जो लोक सेवक कुछ गंभीर अपराधों, जिनमें महिलाओं के विरुद्ध निर्दिष्ट अपराध शामिल हैं, की जानकारी दर्ज नहीं करता, उस पर धारा 199 BNS (पहले धारा 166A IPC) के तहत मुकदमा चल सकता है।

इन आम गलतियों से बचें

  • पुलिस से कार्रवाई "करवाने" के लिए तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना या बिना आधार के नाम जोड़ना। झूठी शिकायत से आप पर खुद आपराधिक दायित्व आ सकता है।
  • बहुत देर करना। बाद में देरी को अक्सर शिकायत की सच्चाई पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए देरी का कारण ईमानदारी से लिखकर बताएँ।
  • सिर्फ़ फ़ोन कॉल या मौखिक मुलाकातों पर भरोसा करना, और कुछ भी कागज़ पर न होना।
  • पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को लिखे बिना सीधे मजिस्ट्रेट के पास जाना, जिससे आवेदन लौटाया जा सकता है।

इस विषय पर और जानकारी हमारे पेज पुलिस FIR दर्ज नहीं कर रही पर, और आपराधिक मामलों के बारे में सामान्य जानकारी हमारे आपराधिक कानून पेज पर पढ़ सकते हैं।

अधिवक्ता आशुतोष हंस अपनी स्थिति के बारे में कोई प्रश्न है? मामले की संक्षिप्त जानकारी और बात करने का सुविधाजनक समय बताएँ।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कानून और उसकी व्याख्या बदलती रहती है; अपनी स्थिति पर सलाह के लिए संपर्क करें.